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नेपाल जलप्रलय का सच: न बारिश, न झील फटी; हिमस्खलन से आया सैलाब

by admin@bebak24.com on | 2026-08-31 11:49:02

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नेपाल जलप्रलय का सच: न बारिश, न झील फटी; हिमस्खलन से आया सैलाब

काठमांडो | बेबाक24 न्यूज़

नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ की वजह को लेकर वैज्ञानिकों की शुरुआती जांच में अहम जानकारी सामने आई है। प्रारंभिक अध्ययन के अनुसार, यह तबाही असाधारण बारिश या ग्लेशियल झील फटने से नहीं, बल्कि ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बर्फ, चट्टानों और मलबे के खिसकने से शुरू हुई।

नेपाल पर्यावरण सोसायटी के लिए तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक, रसुवा के लांगटांग-लिरुंग क्षेत्र में करीब 5200 मीटर की ऊंचाई से बर्फ और चट्टानों का विशाल हिस्सा टूटकर नीचे आया। यह मलबा ल्हेंदे नदी में पहुंचा और तेज बहाव के साथ भोटेकोशी तथा फिर त्रिशूली नदी की ओर बढ़ गया।

7 मिनट में 22 किलोमीटर का सफर

अध्ययन में बताया गया है कि मलबे और पानी का यह बेहद तेज बहाव करीब 7 मिनट में लगभग 22 किलोमीटर की दूरी तय कर रसुवागढ़ी तक पहुंच गया। इस दौरान इसकी अनुमानित औसत गति करीब 167 किलोमीटर प्रति घंटा रही।

बाद के हिस्से में बहाव की रफ्तार कम होती गई, लेकिन अपने साथ बड़ी मात्रा में चट्टान, मिट्टी और तलछट लेकर यह निचले इलाकों की ओर बढ़ता रहा। इसी वजह से नदी के रास्ते में आने वाले कई क्षेत्रों में भारी विनाश हुआ।

अत्यधिक बारिश के प्रमाण नहीं मिले

वैज्ञानिकों ने उपग्रह चित्रों, मौसम संबंधी आंकड़ों, जल विज्ञान और भू-भाग में आए बदलावों का अध्ययन किया। शुरुआती निष्कर्ष में ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में उस दिन असाधारण बारिश या बादल फटने जैसे हालात के प्रमाण नहीं मिले।

अध्ययन में ग्लेशियल झील के अचानक टूटने से आई बाढ़ के भी स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि घटना के पीछे मौजूद पूरी भूगर्भीय प्रक्रिया को समझने के लिए स्थल पर विस्तृत जांच अभी जरूरी है।

ग्लेशियर का हिस्सा भी टूटा

उपग्रह चित्रों के विश्लेषण में करीब 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बड़े भू-आकृतिक बदलाव दिखाई दिए हैं। इसके अलावा लगभग 0.56 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर अलग होने की बात भी सामने आई है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, बर्फ और चट्टानों के इस बड़े पैमाने पर खिसकने ने नदी तंत्र में अचानक असाधारण बहाव पैदा किया, जिसने कुछ ही समय में नीचे के क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले लिया।

जलविद्युत परियोजनाओं को भी भारी नुकसान

इस आपदा का असर नेपाल के ऊर्जा ढांचे पर भी पड़ा है। शुरुआती आंकड़ों के अनुसार 13 जलविद्युत परियोजनाएं और एक सौर ऊर्जा परियोजना प्रभावित हुईं। इससे करीब 431 मेगावाट की विद्युत उत्पादन क्षमता फिलहाल प्रभावित हुई है।

नेपाल में इस आपदा से जनहानि और आर्थिक नुकसान का आकलन अभी जारी है। अधिकारियों के अनुसार मृतकों की संख्या 903 तक पहुंच चुकी है, जबकि कई इलाकों में राहत और खोज अभियान अब भी जारी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटना ने हिमालयी क्षेत्र में हिमस्खलन, भूस्खलन और तेजी से बदलते भू-आकृतिक जोखिमों की निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। भविष्य में ऐसी घटनाओं के प्रभाव को कम करने के लिए ऊंचाई वाले क्षेत्रों की निगरानी और समय पर चेतावनी तंत्र को मजबूत करना जरूरी होगा।



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