by admin@bebak24.com on | 2026-08-30 12:41:53
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लखनऊ | बेबाक24 न्यूज़
नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र से जुड़े उत्तर प्रदेश के इलाकों को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि खतरा केवल भारी बारिश से नहीं, बल्कि भूस्खलन, बर्फ, चट्टानों और मलबे के कारण नदियों का रास्ता रुकने से भी पैदा हो सकता है। ऐसी स्थिति में नदी के बीच बना प्राकृतिक अवरोध अचानक टूटने पर तेज जलप्रवाह मैदानी क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।
लखनऊ स्थित बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज के निदेशक और वरिष्ठ भूगर्भ वैज्ञानिक प्रो. महेश जी ठक्कर के अनुसार, हिमालयी आपदाओं का आकलन अब केवल बारिश और बादल फटने तक सीमित रखना उचित नहीं है। ऊपरी क्षेत्रों में भूस्खलन या ग्लेशियरों की हलचल से नदी का प्रवाह बाधित होने पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
विशेषज्ञ के मुताबिक पहाड़ों से खिसका मलबा, बर्फ और चट्टानें नदी का रास्ता रोक सकती हैं। इससे पानी एक जगह जमा होकर अस्थायी प्राकृतिक बांध बना सकता है। बांध के अचानक टूटने पर पानी के साथ भारी पत्थर और मलबा तेज गति से नीचे की ओर बहता है, जिससे घाटियों और मैदानी इलाकों में बड़ी तबाही हो सकती है।
नेपाल की हालिया आपदा ने इस खतरे को और गंभीरता से समझने की जरूरत को सामने रखा है। उत्तराखंड में भी अतीत में प्राकृतिक अवरोध बनने और उसके टूटने से अचानक बाढ़ की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
नेपाल की त्रिशूली नदी आगे नारायणी और फिर गंडक नदी तंत्र से जुड़ती है। ऐसे में नेपाल के ऊपरी हिस्से में अचानक बढ़ा जलप्रवाह उत्तर प्रदेश के निचले क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है।
इसी तरह भागीरथी और अलकनंदा गंगा नदी तंत्र का हिस्सा हैं, जबकि काली नदी का संबंध शारदा प्रणाली से है। इसलिए उत्तर प्रदेश में बाढ़ की तैयारियों के दौरान केवल स्थानीय वर्षा और नदी के जलस्तर पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा।
विशेषज्ञों ने हिमालयी जलग्रहण क्षेत्र में निगरानी व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया है। उपग्रहों, जलस्तर मापने वाले उपकरणों और दूरस्थ संवेदक प्रणालियों के जरिए ऊपरी क्षेत्रों में होने वाले बदलावों की लगातार निगरानी जरूरी है।
नदी के मार्ग में अवरोध बनने, जलस्तर तेजी से बढ़ने या ग्लेशियर क्षेत्र में असामान्य गतिविधि का संकेत मिलते ही इसकी सूचना निचले जिलों तक पहुंचाने के लिए वास्तविक समय की चेतावनी प्रणाली विकसित करनी होगी।
विशेषज्ञों ने सक्रिय बाढ़ मैदानों, पुराने नदी मार्गों और प्राकृतिक जलनिकासी क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण को भी गंभीर जोखिम बताया है। उनका कहना है कि केवल तटबंध बनाना पर्याप्त नहीं है। बाढ़ की संभावित दिशा, नदी के पुराने मार्ग और हिमालयी क्षेत्र से आने वाले अचानक जलप्रवाह को ध्यान में रखकर दीर्घकालीन आपदा प्रबंधन नीति तैयार करनी होगी।
नेपाल की त्रासदी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्र में होने वाली आपदा का असर सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। इसलिए नेपाल, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के बीच नदी तथा आपदा संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान और पूर्व चेतावनी व्यवस्था को और मजबूत करना समय की जरूरत है।
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