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नदियों का उफान और कागज़ी मुस्तैदी: प्रयागराज से बनारस तक बाढ़ का वही पुराना ड्रामा

by on | 2026-08-30 20:48:31

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नदियों का उफान और कागज़ी मुस्तैदी: प्रयागराज से बनारस तक बाढ़ का वही पुराना ड्रामा


​वाराणसी । पहाड़ों पर बदरा बरसते हैं, बांधों के फाटक खुलते हैं, और उत्तर प्रदेश का प्रशासनिक अमला अचानक 'अलर्ट मोड' का चोला ओढ़ लेता है। प्रयागराज से लेकर बनारस तक गंगा-यमुना अपने रौद्र रूप में हैं, लेकिन सवाल वही बेबाक खड़ा है—हर साल लाखों क्यूसेक पानी छोड़े जाने के बाद ही हमारी पूरी व्यवस्था को 'आपदा' की याद क्यों आती है?

प्रयागराज: 8 लाख क्यूसेक का प्रहार और 100 गांवों पर लटकती तलवार

​प्रयागराज में गंगा और यमुना दोनों उफान पर हैं। कानपुर, नरौरा, माताटीला और हथिनीकुंड बैराजों से छोड़ा गया करीब 8 लाख क्यूसेक पानी अब शहर के गले की फांस बन रहा है।

नदियों का रुख: नैनी में यमुना 81.65 मीटर पर पहुंच चुकी है (36 घंटे में 2 मीटर की बढ़ोतरी)। वहीं फाफामऊ में गंगा 81.76 मीटर पर बह रही हैं। यद्यपि खतरे का निशान 84.73 मीटर है, लेकिन टोंस और बेलन नदियों के पलट-प्रवाह ने सोरांव, फूलपुर और करछना के तटीय इलाकों में अभी से धुकधुकी बढ़ा दी है।


ग्राउंड जीरो: छोटा बघाड़ा में NDRF और अफसर दौरा कर चुके हैं। विभागों की बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन निचली बस्तियों के लोग जानते हैं कि पानी का स्तर जैसे ही सवा मीटर और बढ़ेगा, यह 'निरीक्षण' उनके किसी काम नहीं आने वाला।


बनारस: 4 सेमी/घंटे की रफ्तार, घाट जलमग्न और छतों पर सिमटी आस्था

​प्रयागराज का यही पानी जब डाउनस्ट्रीम में काशी पहुंचता है, तो बनारस की रफ्तार थम जाती है। वाराणसी में गंगा 4 सेंटीमीटर प्रति घंटे की तेज रफ्तार से बढ़ रही हैं और चेतावनी बिंदु (70.262 मीटर) से महज 1 मीटर दूर हैं।

ठप पड़ा जीवन: अस्सी से मणिकर्णिका तक सभी घाटों का संपर्क आपस में टूट चुका है। नौका संचालन बंद है, विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती को मजबूरी में छतों पर शिफ्ट करना पड़ा है, और अंतिम संस्कार के लिए परिजनों को गलियों व छतों का सहारा लेना पड़ रहा है।


वरुणा का बैकवॉटर: गंगा के दबाव से वरुणा का प्रवाह रुक गया है। पुरानापुल, सारनाथ और सलारपुर के घरों में नालों का पानी घुसने लगा है।


​NDRF की गश्त, लाउडस्पीकर की चेतावनी और राहत चौकियों के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन असलियत यही है कि बुनियादी जल निकासी और स्थायी बाढ़ प्रबंधन के नाम पर हर साल सिर्फ आंकड़ों का खेल खेला जाता है।



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