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कार्बन कर की मार: यूरोप में घट सकती है भारतीय स्टील-एल्युमिनियम की मांग, छोटे उद्योगों पर बढ़ेगा दबाव

by on | 2026-08-21 15:58:00

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कार्बन कर की मार: यूरोप में घट सकती है भारतीय स्टील-एल्युमिनियम की मांग, छोटे उद्योगों पर बढ़ेगा दबाव

नई दिल्ली | बेबाक24 न्यूज़

यूरोपीय बाजार में भारतीय इस्पात और एल्युमिनियम निर्यातकों की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र को टालने की भारत की कोशिशों के सफल नहीं होने के बाद जनवरी 2027 से इस व्यवस्था का पूरा प्रभाव भारतीय निर्यातकों पर पड़ने की संभावना है।

इसका सीधा असर यूरोप में भारतीय उत्पादों की लागत पर पड़ेगा। अनुमान है कि निर्यातकों को प्रति टन 55 से 80 यूरो तक अतिरिक्त कार्बन शुल्क का सामना करना पड़ सकता है। इससे भारतीय उत्पाद यूरोपीय बाजार में दूसरे देशों के सामान के मुकाबले महंगे पड़ सकते हैं और निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है।

क्या है यूरोपीय संघ का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र?

कार्बन सीमा समायोजन तंत्र ऐसी व्यवस्था है जिसके तहत अधिक कार्बन उत्सर्जन वाले देशों से यूरोपीय बाजार में आने वाले कुछ उत्पादों पर उनके उत्पादन के दौरान हुए कार्बन उत्सर्जन के आधार पर शुल्क लगाया जाता है।

शुरुआत में इसका दायरा इस्पात, एल्युमिनियम, सीमेंट, उर्वरक, हाइड्रोजन और बिजली जैसे प्रमुख क्षेत्रों तक सीमित था। अब यूरोपीय संघ इसे इन कच्चे माल से बनने वाले अनेक तैयार उत्पादों तक विस्तार देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

इसमें वाहन के पुर्जे, मशीनरी और दूसरे धातु आधारित उत्पाद शामिल हो सकते हैं।

भारत के करीब 6 अरब डॉलर के निर्यात पर असर

औद्योगिक संगठन फिक्की के अनुसार, भारत से यूरोपीय संघ को हर साल करीब 6 अरब डॉलर का इस्पात और एल्युमिनियम निर्यात होता है।

इसमें लगभग 3.5 अरब डॉलर का लोहा एवं इस्पात और 2.5 अरब डॉलर का एल्युमिनियम शामिल है।

यानी यह व्यवस्था भारतीय उद्योग के लिए केवल पर्यावरण से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि इसके सीधे आर्थिक और निर्यात संबंधी प्रभाव भी हो सकते हैं।

भारतीय इस्पात कंपनियों पर बढ़ेगा दबाव

इस्पात क्षेत्र में टाटा स्टील, सेल, जेएसडब्ल्यू स्टील, आर्सेलरमित्तल निप्पॉन, जिंदल स्टील और राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड जैसी बड़ी कंपनियां यूरोपीय बाजार में निर्यात करती हैं।

आर्थिक शोध संस्थान आईसीआरआईईआर के अनुमान के अनुसार, कार्बन शुल्क लागू होने के बाद यूरोपीय संघ को भारत के इस्पात निर्यात में 24 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है।

चालू वित्त वर्ष के शुरुआती 4 महीनों में ही इस्पात निर्यात में 13 प्रतिशत की कमी दर्ज किए जाने की बात कही गई है।

एल्युमिनियम उद्योग के सामने भी बड़ी चुनौती

एल्युमिनियम उद्योग भी इस बदलाव से बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। वेदांता, हिंडाल्को इंडस्ट्रीज, नाल्को और जिंदल एल्युमिनियम जैसी कंपनियों पर अतिरिक्त कार्बन शुल्क का असर पड़ने की आशंका है।

एल्युमिनियम निर्माण में बड़ी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है। भारत में बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा अभी भी कोयले पर निर्भर है। इसलिए भारतीय एल्युमिनियम की कार्बन तीव्रता अधिक होने पर यूरोपीय बाजार में उस पर अतिरिक्त शुल्क का बोझ बढ़ सकता है।

इसका सीधा असर कंपनियों के निर्यात लाभांश और मूल्य प्रतिस्पर्धा पर पड़ सकता है।

सबसे ज्यादा संकट छोटे और मझोले उद्योगों पर

बड़ी कंपनियों के मुकाबले छोटे और मझोले निर्यातकों के लिए यह बदलाव अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

वाहन पुर्जे, मशीनरी के हिस्से, तैयार धातु उत्पाद और पाइप बनाने वाली अनेक छोटी और मझोली इकाइयां यूरोपीय आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी हैं।

इन कंपनियों के पास बड़ी कंपनियों की तरह अत्याधुनिक पर्यावरणीय तकनीक लगाने, उत्सर्जन का विस्तृत लेखा तैयार करने और महंगे परीक्षण कराने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते।

2028 से जब इस व्यवस्था के दायरे में और तैयार उत्पाद जोड़े जाएंगे, तब भारतीय इंजीनियरी निर्यात पर दबाव और बढ़ने की आशंका है।

कोयले पर निर्भरता भारत की सबसे बड़ी कमजोरी

भारतीय उद्योगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बिजली उत्पादन में कोयले की बड़ी भूमिका है।

कार्बन सीमा समायोजन तंत्र के तहत केवल कारखाने से सीधे निकलने वाले उत्सर्जन पर ही नहीं, बल्कि कुछ मामलों में उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली बिजली से जुड़े अप्रत्यक्ष उत्सर्जन को भी महत्व दिया जाता है।

इससे उन भारतीय उद्योगों पर अधिक दबाव पड़ सकता है जिनका उत्पादन मुख्य रूप से कोयला आधारित बिजली पर निर्भर है।

निर्यातक अचानक अपनी ऊर्जा व्यवस्था बदल नहीं सकते। इसके लिए बड़े निवेश, नई तकनीक और वर्षों की योजना की जरूरत होती है।

क्या भारत के पास कोई रास्ता है?

भारत ने यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौते के जरिए बाजार पहुंच बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं, लेकिन कार्बन शुल्क की चुनौती अलग है।

विशेषज्ञों के अनुसार, केवल कूटनीतिक बातचीत या शुल्क में छूट की उम्मीद लंबे समय तक समाधान नहीं देगी। भारतीय उद्योगों को अपनी उत्पादन प्रक्रिया को हरित बनाना होगा।

अक्षय ऊर्जा, कम कार्बन वाली बिजली, हरित हाइड्रोजन और ऊर्जा दक्ष तकनीकों में निवेश इस चुनौती से निपटने के प्रमुख साधन हो सकते हैं।

भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि वैश्विक हरित अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है, जबकि देश के कई भारी उद्योग अभी भी जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा पर निर्भर हैं।

अब ‘हरित उत्पादन’ मजबूरी बन रहा

कार्बन सीमा समायोजन तंत्र का असर केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहेगा। दुनिया के दूसरे विकसित बाजार भी भविष्य में आयातित उत्पादों के कार्बन उत्सर्जन को कीमत तय करने का आधार बना सकते हैं।

ऐसे में भारतीय उद्योगों के लिए कम कार्बन वाला उत्पादन अब केवल पर्यावरणीय जिम्मेदारी नहीं, बल्कि निर्यात बचाने की आर्थिक जरूरत बनता जा रहा है।

बेबाक24 का नजरिया

भारत के सामने चुनौती साफ है—सस्ता उत्पादन या स्वच्छ उत्पादन में से किसी एक को चुनने का समय खत्म हो रहा है। वैश्विक बाजार धीरे-धीरे कार्बन उत्सर्जन को भी उत्पाद की कीमत का हिस्सा बना रहा है।

बेबाक24 का मानना है कि सरकार को छोटे और मझोले निर्यातकों के लिए हरित तकनीक अपनाने पर वित्तीय सहायता, आसान ऋण, ऊर्जा संक्रमण की सुविधा और कार्बन लेखांकन की सरल व्यवस्था देनी चाहिए। केवल बड़ी कंपनियों का हरित बदलाव भारतीय निर्यात को नहीं बचा सकता।

आने वाले वर्षों में यदि भारत अपने इस्पात, एल्युमिनियम और इंजीनियरी उद्योगों को कम कार्बन वाला नहीं बनाता, तो यूरोपीय बाजार में केवल शुल्क ही नहीं बढ़ेगा, बल्कि भारतीय उत्पादों की जगह दूसरे देशों के उत्पाद भी ले सकते हैं।



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