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'दम' या कानून के मुंह पर तमाचा? हत्यारे का भव्य स्वागत और लाचार सिस्टम!

by on | 2026-07-31 08:31:39

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'दम' या कानून के मुंह पर तमाचा? हत्यारे का भव्य स्वागत और लाचार सिस्टम!

बक्सर : 15 साल पुराना खूनी खेल, 10 साल की फरारी, फिर अदालत से उम्रकैद की सजा... और जब वही हत्यारा जेल की सलाखों से बाहर आता है, तो बक्सर की सड़कों पर लाल कालीन नहीं, लेकिन गाड़ियों के काफिले और फूलों की बारिश जरूर दिखाई देती है!

​रामसुरेश उर्फ लांगा यादव, जिसने 2011 में चुनावी रंजिश में तस्कर रंणजीत राय की हत्या कर दी थी, गुरुवार को बक्सर केंद्रीय जेल से अपनी सजा पूरी कर बाहर आया। मगर रिहाई के बाद का नजारा किसी 'जननायक' के स्वागत जैसा था, जिसने सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था और पुलिस प्रशासन के मुंह पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

सड़क पर ‘औकात’ का प्रदर्शन या खुलेआम दबंगई?

​जेल के दरवाजे से लेकर चौसा प्रखंड के सरेंजा गांव तक गाड़ियों का ऐसा रेला निकला कि लगा जैसे कोई विजय जुलूस हो। सुबह के साढ़े दस बजे चौसा ओवरब्रिज को इस कदर जाम कर दिया गया कि आम जनता सड़कों पर तड़पती रही, लेकिन लांगा यादव के समर्थकों को सिर्फ अपनी ताकत दिखानी थी।

​दरअसल, लांगा की पत्नी फिलहाल सरेंजा पंचायत की मुखिया हैं। ऐसे में सत्ता और चुनावी वर्चस्व की हनक दिखाने के लिए साथियों ने इस शक्ति प्रदर्शन की पूरी पटकथा पहले से लिख रखी थी। बक्सर की सड़कों पर 'दम' दिखाने का यह हुड़दंग आम जनता में खौफ पैदा करने की सीधी चाल नजर आती है।

एंबुलेंस का मुखौटा और अपराध का पुराना दाग

​जेल से छूटते ही लांगा यादव ने अपने पैतृक गांव में सभा बुलाई और स्थानीय अस्पताल को एंबुलेंस देने की बड़ी-बड़ी बातें कीं। पर सवाल यह है कि क्या एक एंबुलेंस दान कर देने से रणजीत राय के खून के छींटे धुल जाएंगे? बेबाक 24 का साफ मानना है कि यह और कुछ नहीं, बल्कि पुराने आपराधिक इतिहास पर 'समाजसेवा' का पेंट चढ़ाने की सस्ती कोशिश है।

बेबाक सवाल:

सवाल 1: जब एक सजायाफ्ता मुजरिम ओवरब्रिज जाम कर गाड़ियों का काफिला निकाल रहा था, तब बक्सर प्रशासन और पुलिस कहाँ सो रही थी?


सवाल 2: क्या कानून का डर सिर्फ आम जनता के लिए है, और दबंगों के लिए सड़कों पर हुड़दंग की छूट?


​रिहाई के बाद हुए इस तमाशे ने सरेंजा और आसपास के इलाकों में पुरानी रंजिशों और खूनी वर्चस्व की आग में फिर से घी डालने का काम किया है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस 'दहशत' पर नकेल कसता है या फिर चुपचाप तमाशा देखता रहता है।



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