by on | 2026-05-29 21:51:15
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कोलकाता | पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर आंतरिक कलह और बगावत के सुर लगातार तेज होते जा रहे हैं। हाल ही में फलता सीट पर हुए दोबारा मतदान में टीएमसी की करारी हार और पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के इस्तीफों के बीच, पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी नई कविता 'गिरगिटी' के जरिए बागियों को कड़ा संदेश दिया है।
राजनीतिक गलियारों में इस कविता को उन नेताओं पर सीधा हमला माना जा रहा है, जो चुनावी हार के बाद निजी स्वार्थ, वित्तीय हितों और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए अपनी वफादारी बदल रहे हैं या पार्टी आलाकमान की खुलकर आलोचना कर रहे हैं।
"कुछ लोग गिरगिट से भी ज्यादा खतरनाक" — ममता बनर्जी
ममता बनर्जी ने इस कविता को अपने सोशल मीडिया हैंडल पर साझा किया है। बिना किसी का नाम लिए उन्होंने सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों, कृतज्ञता और विचारधारा की कमी पर गहरा दुख जताया है:
- चरित्र बदलने पर सवाल: कविता में तीखे सवाल दागते हुए पूछा गया है— "आप अपना चरित्र और कितना बदलना चाहते हैं? आपके चरणों में कितनी रिश्वत है? आप खुद को और कितना बदलना चाहते हैं?"
- स्वार्थ की राजनीति: पूर्व मुख्यमंत्री ने लिखा कि कुछ लोग हालात बदलते ही अपनी सुविधा के अनुसार रिश्तों और विश्वास को बदल लेते हैं। ऐसे लोग गिरगिट से भी ज्यादा खतरनाक हैं जो चंद घंटों में अपना पाला बदल लेते हैं।
'दखल' के बाद 'गिरगिटी' — कविताओं के जरिए सियासी संदेश
यह पहली बार नहीं है जब चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कलम का सहारा लिया है। इससे पहले उन्होंने 'दखल' (कब्जा) नाम की एक और कविता लिखी थी, जिसने राजनीतिक हलकों में काफी सुर्खियां बटोरी थीं।
- बुलडोजर कार्रवाई पर था निशाना: 'दखल' कविता के जरिए उन्होंने राज्य की नई भाजपा सरकार द्वारा कोलकाता और विभिन्न जिलों में अवैध निर्माणों के खिलाफ चलाए जा रहे कड़े अभियान और "बुलडोजर कार्रवाई" की आलोचना की थी।
चुनावी हार के बाद अपनों को सहेजने की चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, ममता बनर्जी द्वारा कविता को राजनीतिक हथियार बनाना यह साफ करता है कि इस समय तृणमूल कांग्रेस बेहद कठिन दौर और संगठनात्मक संकट से गुजर रही है। राज्य की सत्ता हाथ से जाने के बाद नेताओं का मोहभंग होना और भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर पार्टी छोड़ना स्वाभाविक है। ऐसे में जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने या सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने के बजाय केवल सोशल मीडिया पर कविताओं के जरिए वफादारी की दुहाई देना, यह दर्शाता है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के पास फिलहाल इस बगावत को रोकने की कोई ठोस जमीनी रणनीति नहीं है।
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