ब्रेकिंग न्यूज़
सोमनाथ में श्रद्धा और शक्ति का सैलाब: पीएम मोदी ने डमरू बजाकर और त्रिशूल थामकर किया 'शौर्य यात्रा' का शंखनाद
ताजा खबर ताजा खबर

गाजीपुर में खाद का 'खेला' और प्रशासन का 'खेला' रोकने का दावा !

by on | 2026-05-15 22:45:19

Share: Facebook | Twitter | WhatsApp | LinkedIn Visits: 3238


गाजीपुर में खाद का 'खेला' और प्रशासन का 'खेला' रोकने का दावा !


गाजीपुर।  ​सरकारी फाइलों में 'गुलाबी' गाजीपुर की हकीकत जब खाद की दुकानों पर उतरती है, तो रंग 'काला' हो जाता है। मुख्य विकास अधिकारी (CDO) आलोक प्रसाद ने बैठकें कीं, निर्देश दिए और 'रासुका' (NSA) जैसी भारी-भरकम धाराओं की घुड़की भी दी। लेकिन सवाल वही है—क्या ये आदेश उन सिंडिकेट्स की दीवारों को तोड़ पाएंगे जो विभाग की नाक के नीचे फल-फूल रहे हैं?

सरकारी फरमान: रस्म अदायगी या सख्ती?

​CDO साहब ने साफ कह दिया है कि थोक से लेकर फुटकर तक एक्नॉलेजमेंट रीयल टाइम होना चाहिए। खाद के साथ ज़बरन कोई दूसरा प्रोडक्ट (टैगिंग) बेचा तो खैर नहीं। डीबीटी (DBT) के जरिए वास्तविक किसान का नाम दर्ज हो और सबसे बड़ी बात—अब खाद 'फार्मर रजिस्ट्री' के बिना नहीं मिलेगी।

प्रशासन की चेतावनी:

​यूरिया और डीएपी निर्धारित रेट पर ही बिकेगी।


​MRP से एक रुपया भी ज्यादा लिया या जबरदस्ती नैनो यूरिया/सल्फर थमाया, तो सीधे रासुका लगेगी।


​बिहार बॉर्डर से लगे ब्लॉक (जमानिया, रेवतीपुर, भदौरा, मोहम्मदाबाद, भांवरकोल) में तस्करी रोकने के लिए पुलिस और प्रशासन का 'सचल दल' (Flying Squad) तैनात कर दिया गया है।


बेबाक विश्लेषण: रामदेव कुशवाहा फर्म और विभाग की 'मौन' सहमति?

​सरकारी विज्ञप्ति में तो सब चंगा दिख रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत का कड़वा सच मोहम्मदाबाद यूसुफपुर की गलियों में छिपा है। सूत्रों की मानें तो खाद की कालाबाजारी का खेल बिना 'खाकी और खादी' के आशीर्वाद के मुमकिन नहीं है।

​क्षेत्रीय किसानों के बीच चर्चा का केंद्र बनी 'रामदेव कुशवाहा फर्म' पर गंभीर सवालिया निशान हैं। किसानों का आरोप है कि:

​हर रैक में कोटा होने के बावजूद, पीक सीजन में किसानों को डीएपी (DAP) के लिए तरसा दिया जाता है।


​जब किसान लाइन में खड़ा होता है, तब स्टॉक 'खत्म' बताया जाता है, जबकि पर्दे के पीछे वही खाद काले बाजार में ऊंचे दामों पर खपा दी जाती है।


​कहा जा रहा है कि अगर इस फर्म की निष्पक्ष जांच हो जाए, तो विभाग के बड़े अधिकारियों के चेहरे बेनकाब हो सकते हैं।


सवालिया निशान: क्या अक्टूबर में खुलेगी पोल?

​अभी तो रबी की तैयारी और बैठकों का दौर है। प्रशासन दावा कर रहा है कि खाद की कोई कमी नहीं है। लेकिन असली परीक्षा अक्टूबर में होगी जब डीएपी की मांग चरम पर होगी।

​क्या जिलाधिकारी का 'सचल दल' सिर्फ सड़कों पर गश्त करेगा या उन रसूखदार 'मास्टरमाइंड' विक्रेताओं के गोदामों तक भी पहुंचेगा जो पूरे जनपद की खाद डकार जाते हैं?

बेबाक की टिप्पणी: साहब, निर्देश तो हर साल जारी होते हैं, लेकिन किसान को खाद की बोरी तब मिलती है जब उसकी जेब कट चुकी होती है। रामदेव कुशवाहा जैसी फर्मों की जांच होगी या फिर 'दूध का दूध और पानी का पानी' सरकारी फाइल के सफेद पन्नों में ही दफन हो जाएगा?



Search
Recent News
Top Trending
Most Popular

Leave a Comment