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शेरपुर की उपेक्षित शहादत और इतिहास का तकाजा

by on | 2026-08-29 12:38:58

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शेरपुर की उपेक्षित शहादत और इतिहास का तकाजा

अनुष्का राय

​सन बयालीस के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के पन्नों को जब भी पलटा जाता है, पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के शेरपुर गांव का जिक्र स्वतंत्रता संग्राम की उस परकाष्ठा के रूप में सामने आता है, जहां देशभक्ति की अलख ने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। 18 अगस्त 1942 को मुहम्मदाबाद तहसील पर तिरंगा फहराने की जिद में डॉ. शिवपूजन राय और उनके सात साथियों ने अपनी छाती पर अंग्रेजों की गोलियां खाई थीं। लेकिन यह शहादत सिर्फ एक घटना भर नहीं थी, बल्कि दमन और प्रतिशोध की उस खूनी कहानी की शुरुआत थी, जिसका सबसे बर्बर रूप 29 अगस्त 1942 को सामने आया।

​स्टीमरों पर सवार होकर पहुंची बलूच रेजिमेंट, आसमान में मंडराते ब्रिटिश विमान और बाढ़ के पानी से घिरा शेरपुर—अंग्रेजी हुकूमत ने गांव को नेस्तनाबूद करने का पूरा खाका खींच लिया था। लाठियां और पारंपरिक हथियार लिए ग्रामीणों के अभेद्य प्रतिरोध के सामने जब औपनिवेशिक सत्ता असहाय दिखी, तो छल का सहारा लिया गया। तत्कालीन जिलाधिकारी मुनरो ने शांति वार्ता का ढोंग रचा, और गांव के बुजुर्गों के सरल विश्वास का फायदा उठाकर गांव में दाखिल हुआ। इसके बाद हार्डी और नेदरशोल के नेतृत्व में जो बर्बरता हुई, वह ब्रिटिश दमनकारी नीति के क्रूरतम अध्यायों में से एक है। सैकड़ों ग्रामीणों को दिनभर घुटने भर पानी में खड़ा रखना, 20 हजार रुपये का सामूहिक जुर्माना और डॉ. शिवपूजन राय के भ्रम में 'शिवपूजन राय' नाम वाले सात निरपराध लोगों के घरों को जलाकर राख कर देना—यह सब एक औपनिवेशिक सत्ता की बौखलाहट को दर्शाता था। इसी दमन चक्र में रामाशंकर लाल, राधिका पंडाइन और खेदन यादव ने भी अपनी मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर कर दिए।

​विडंबना यह है कि आजादी के आठ दशकों बाद भी शेरपुर की यह अद्वितीय क्रांति और बलिदानी गाथा राष्ट्रीय पटल पर वह स्थान नहीं पा सकी, जिसकी यह हकदार थी। स्वाधीनता के बाद बनी सरकारों की प्राथमिकताओं में स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे सुदूर आंचलिक केंद्रों को सहेजने के प्रति जो उदासीनता रही, उसी का नतीजा है कि आज भी 'शहीदाने शेरपुर' उपेक्षा का शिकार हैं। चुनाव आते ही जनप्रतिनिधियों के वादे और खोखले आश्वासन तो सामने आते हैं, लेकिन शहीदों के स्मारकों की बदहाली और इतिहास की किताबों में इस घटना का गायब होना हमारे सामूहिक बोध पर सवाल खड़े करता है।

​किसी भी राष्ट्र के लिए अपने शहीदों की स्मृति केवल औपचारिकता या एक दिन का समारोह नहीं होनी चाहिए। शेरपुर का बलिदान महज एक स्थानीय घटनाक्रम नहीं, बल्कि भारतीय जनमानस के अदम्य स्वाभिमान का प्रतीक है। इतिहास का तकाजा है कि शासन-प्रशासन और अकादमिक जगत इस ऐतिहासिक भूल को सुधारे और शेरपुर के इस महान क्रांति-अध्याय को वह राष्ट्रीय दर्जा और सम्मान दे, जिसके लिए इन वीरों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था।



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