by admin@bebak24.com on | 2026-08-26 13:24:05
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नई दिल्ली | बेबाक24 न्यूज़
देश के प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या का सिलसिला चिंता बढ़ा रहा है। केंद्र की ओर से सुधारात्मक कदम उठाए जाने के बावजूद आईआईटी जैसे संस्थानों में पिछले 5 वर्षों में करीब 70 छात्रों की आत्महत्या की बात सामने आई है। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के बाद भी ऐसी घटनाएं सामने आने से कैंपस के शैक्षणिक दबाव, सामाजिक माहौल और मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक देश के आईआईटी में 2021 से 2025 के बीच बड़ी संख्या में छात्रों ने आत्महत्या की। ग्लोबल आईआईटी एलुमनाई सपोर्ट ग्रुप का दावा है कि जनवरी 2021 से दिसंबर 2025 के बीच 65 आईआईटी छात्रों ने आत्महत्या की, जिनमें 30 मामले अकेले 2024 और 2025 में सामने आए।
इसी बीच नए सत्र में भी आईआईटी में 3 और आईआईएम में 1 छात्र की आत्महत्या की सूचना सामने आ चुकी है। आईआईएससी बंगलूरू में भी 15 दिनों के भीतर 2 छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं ने चिंता और बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों और छात्रों से जुड़े दावों के अनुसार, आत्महत्या के मामलों के पीछे केवल पढ़ाई का दबाव जिम्मेदार नहीं है। कैंपस और छात्रावास में भाषा, जाति और आर्थिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
क्षेत्रीय भाषा या ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को कभी-कभी खुद को बाकी छात्रों से अलग महसूस होने की समस्या का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियां आत्मविश्वास और शैक्षणिक प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती हैं और लंबे समय तक तनाव बढ़ा सकती हैं।
छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सबसे बड़ी चिंता संस्थानों में उपलब्ध सहायता व्यवस्था की बताई जा रही है। दावों के मुताबिक 70% से अधिक संस्थानों में पूर्णकालिक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं। केवल करीब 10% संस्थानों में ऐसी सुविधा नियमित रूप से मौजूद बताई गई है।
काउंसलिंग उपलब्ध होने के बावजूद कई छात्र सामाजिक दबाव, बदनामी के डर या अपनी समस्या सार्वजनिक होने की आशंका के कारण मदद लेने से बचते हैं।
प्रौद्योगिकी संस्थानों के करीब 2.5 लाख युवाओं पर किए गए एक सर्वे से भी छात्रों की मानसिक स्थिति को लेकर चिंता सामने आई। सर्वे में 34% छात्रों ने खुद को कैंपस में बाहरी महसूस करने की बात कही।
वहीं, केवल 56% छात्रों ने संस्थान के प्रशासन पर भरोसा जताया। 32% छात्रों ने कहा कि उनके संस्थान में काउंसलिंग सुविधा उपलब्ध नहीं है, जबकि 26% छात्रों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाओं की जानकारी तक नहीं थी।
करीब 15% छात्रों ने गंभीर मानसिक तनाव से गुजरने की बात कही और 9% ने माना कि कठिन दौर में उन्हें आत्महत्या जैसे विचार भी आए।
छात्र आत्महत्या के मामलों की जांच के लिए केंद्र सरकार ने जनवरी 2026 में 3 सदस्यीय समिति गठित की थी। समिति की ओर से भी यह संकेत दिया गया था कि संस्थानों में स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं है और सुधार की जरूरत है।
आईआईटी-आईआईएम जैसे संस्थानों में छात्रों से उच्च प्रदर्शन की अपेक्षा स्वाभाविक है, लेकिन इसके साथ सुरक्षित और सहायक शैक्षणिक वातावरण भी जरूरी है। विशेषज्ञों के मुताबिक नियमित मानसिक स्वास्थ्य सहायता, भेदभाव के खिलाफ प्रभावी व्यवस्था, गोपनीय काउंसलिंग और छात्रों की समस्याओं पर समय रहते कार्रवाई को संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा।
बेबाक24 निष्कर्ष: इन आंकड़ों का सबसे गंभीर संदेश यह है कि केवल अकादमिक उत्कृष्टता के लिए पहचाने जाने वाले संस्थानों में छात्रों की मानसिक सुरक्षा को भी उतनी ही प्राथमिकता देनी होगी। किसी छात्र की परेशानी को कमजोरी नहीं, बल्कि समय रहते मदद की जरूरत के रूप में देखने वाली कैंपस संस्कृति ही इस संकट से निपटने की दिशा में वास्तविक बदलाव ला सकती है।
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