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ट्रंप को भाया भारत का चुनावी मॉडल: अमेरिका में वोटर ID अनिवार्य करने पर क्यों जोर? जानें ‘सेव अमेरिका एक्ट’ का पूरा विवाद

by admin@bebak24.com on | 2026-08-18 12:12:49

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ट्रंप को भाया भारत का चुनावी मॉडल: अमेरिका में वोटर ID अनिवार्य करने पर क्यों जोर? जानें ‘सेव अमेरिका एक्ट’ का पूरा विवाद

वॉशिंगटन | बेबाक24 न्यूज़

अमेरिका में चुनावी नियमों को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था का उदाहरण देते हुए अमेरिका में मतदाताओं के लिए फोटो पहचान पत्र अनिवार्य करने की मांग दोहराई है। ट्रंप का तर्क है कि जब भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में पहचान और मतदाता सत्यापन के साथ बड़े पैमाने पर चुनाव कराए जा सकते हैं, तो अमेरिका में भी चुनाव प्रक्रिया को इसी तरह अधिक कड़ा बनाया जाना चाहिए।

ट्रंप ने इसी मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए ‘सेव अमेरिका एक्ट’ पारित करने की मांग की है। प्रस्तावित कानून को लेकर अमेरिका में राजनीतिक मतभेद पहले से मौजूद हैं।

भारत के चुनाव का उदाहरण देकर ट्रंप ने क्या कहा?

ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट में भारत के हालिया आम चुनाव का हवाला दिया। उन्होंने दावा किया कि भारत में करीब 64.6 करोड़ लोगों ने मतदान किया और डाक मतपत्र का इस्तेमाल करने वाले मतदाताओं की संख्या 1% से भी कम रही।

ट्रंप ने यह भी दावा किया कि भारत में मतदान के लिए वैध फोटो पहचान पत्र की व्यवस्था है। उन्होंने भारत की चुनाव प्रक्रिया को अमेरिका के लिए उदाहरण बताते हुए कहा कि अमेरिकी चुनावों में भी मतदाता की पहचान और नागरिकता को लेकर कड़े नियम होने चाहिए।

ट्रंप के मुताबिक, इससे चुनाव में संभावित धोखाधड़ी पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है।

क्या है ‘सेव अमेरिका एक्ट’?

ट्रंप जिस कानून की पैरवी कर रहे हैं, उसका पूरा नाम सेफगार्ड अमेरिकन वोटर एलिजिबिलिटी एक्ट बताया गया है। प्रस्तावित कानून के तहत अमेरिकी नागरिकों को मतदान के लिए पंजीकरण कराते समय अपनी नागरिकता का प्रमाण देना पड़ सकता है।

इसके अलावा देशभर में मतदाता पहचान पत्र की व्यवस्था लागू करने और डाक से मतदान के नियमों को अधिक सख्त करने जैसे प्रावधानों की बात कही गई है।

ट्रंप और उनके समर्थकों का तर्क है कि मतदाता की पहचान और नागरिकता की पुष्टि चुनाव की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है।

अमेरिका में क्यों छिड़ी है बहस?

अमेरिका में मतदाता पहचान पत्र का मुद्दा केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रहा है।

रिपब्लिकन नेता आम तौर पर मतदाता पहचान और नागरिकता सत्यापन के कड़े नियमों को चुनाव की सुरक्षा के लिए जरूरी बताते हैं। दूसरी ओर, डेमोक्रेटिक पार्टी और नागरिक अधिकारों से जुड़े कई समूहों का तर्क रहा है कि अत्यधिक सख्त पहचान संबंधी नियम कुछ वैध मतदाताओं के लिए मतदान को मुश्किल बना सकते हैं।

यही वजह है कि प्रस्तावित कानून को लेकर दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच व्यापक सहमति नहीं बन पाई है।

ट्रंप के लिए भारत का उदाहरण क्यों अहम?

भारत का उदाहरण देकर ट्रंप ने अमेरिकी चुनावी बहस को एक अंतरराष्ट्रीय संदर्भ दिया है। भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक है और यहां करोड़ों मतदाताओं के साथ बड़े पैमाने पर चुनाव कराए जाते हैं।

ट्रंप इसी तथ्य को अपने तर्क के समर्थन में इस्तेमाल कर रहे हैं कि बड़ी संख्या में मतदाताओं वाले देश में भी पहचान आधारित चुनावी व्यवस्था लागू की जा सकती है।

हालांकि, भारत और अमेरिका की चुनावी व्यवस्थाएं पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं। दोनों देशों में मतदाता पंजीकरण, चुनाव संचालन, डाक मतदान और पहचान सत्यापन की प्रक्रियाएं अलग-अलग हैं। इसलिए भारत के मॉडल को अमेरिका में सीधे लागू करना एक अलग राजनीतिक और कानूनी सवाल है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार का क्या संबंध?

ट्रंप ने अपने बयान में भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि भारतीय मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने अमेरिकी प्रशासन के सामने यह सवाल उठाया था कि अमेरिका में वैध फोटो पहचान पत्र के बिना चुनाव कैसे कराए जाते हैं।

इसी संदर्भ को ट्रंप ने अमेरिका में पहचान पत्र संबंधी नियमों को मजबूत करने के अपने तर्क से जोड़ा है।

हालांकि, ट्रंप के इस दावे और भारतीय चुनाव व्यवस्था से जुड़े उनके अन्य बयानों को उनके राजनीतिक तर्क के संदर्भ में देखना जरूरी है। भारत की चुनाव प्रक्रिया और अमेरिका की चुनाव प्रणाली में संस्थागत स्तर पर कई महत्वपूर्ण अंतर हैं।

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी किया समर्थन

भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने भी ट्रंप के बयान का समर्थन किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप सही हैं और भारत में हुए पिछले चुनाव का उदाहरण देते हुए अमेरिकी कांग्रेस से ‘सेव अमेरिका एक्ट’ पारित करने की अपील की।

उन्होंने भी भारत में 64.6 करोड़ मतदाताओं के मतदान और पहचान पत्र की व्यवस्था का उल्लेख किया।

क्या कानून तुरंत लागू हो जाएगा?

फिलहाल ऐसा नहीं है। ट्रंप की मांग के बावजूद प्रस्तावित कानून को अमेरिकी कांग्रेस में राजनीतिक और विधायी प्रक्रिया से गुजरना होगा।

सीनेट में इस कानून को लेकर अभी तक अंतिम सहमति नहीं बन पाई है। अगस्त की शुरुआत में अमेरिकी सीनेट पांच सप्ताह के अवकाश पर चली गई थी। ऐसे में ट्रंप द्वारा भारत का उदाहरण देकर कानून पारित करने की मांग दोहराना मुख्य रूप से चल रही अमेरिकी राजनीतिक बहस को प्रभावित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

भारत का मॉडल बना अमेरिकी राजनीति में नया मुद्दा

ट्रंप के बयान ने एक बार फिर अमेरिका में मतदाता पहचान, नागरिकता सत्यापन और चुनावी विश्वसनीयता जैसे मुद्दों को बहस के केंद्र में ला दिया है। खास बात यह है कि इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने तर्क के समर्थन में भारत की चुनाव व्यवस्था को उदाहरण बनाया है।

अब असली सवाल यह है कि क्या ट्रंप की यह मुहिम कांग्रेस में पर्याप्त समर्थन जुटा पाएगी या फिर वोटर ID का मुद्दा अमेरिकी राजनीति में पहले की तरह ही गहरे मतभेदों में उलझा रहेगा।



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