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अमेरिकी सीनेट के रूस-ईरान प्रतिबंध बिल पर पवन खेड़ा का केंद्र पर हमला, बोले- भारत पर दबाव क्यों?

by on | 2026-08-08 15:40:02

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अमेरिकी सीनेट के रूस-ईरान प्रतिबंध बिल पर पवन खेड़ा का केंद्र पर हमला, बोले- भारत पर दबाव क्यों?

नई दिल्ली | बेबाक24 न्यूज़

रूस से भारत की तेल खरीद को लेकर अमेरिकी सीनेट में पारित प्रतिबंध संबंधी विधेयक पर भारत में भी राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आने लगी है। कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने इस मुद्दे को लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है।

अमेरिकी सीनेट ने रूस और ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने से जुड़े एक विधेयक को भारी बहुमत से मंजूरी दी है। प्रस्ताव का संभावित असर भारत और चीन जैसे रूस से बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम उत्पाद खरीदने वाले देशों पर पड़ सकता है।

पवन खेड़ा ने केंद्र सरकार पर साधा निशाना

सीनेट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए पवन खेड़ा ने सवाल उठाया कि क्या भारत वास्तव में अपनी विदेश नीति और ऊर्जा जरूरतों पर स्वतंत्र रूप से फैसला ले पा रहा है।

कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि अलग-अलग देश भारत के सामने अपनी शर्तें रख रहे हैं और तेल खरीद जैसे रणनीतिक मामलों में भी दबाव बनाया जा रहा है।

खेड़ा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधते हुए कहा कि सरकार को इन परिस्थितियों पर जवाब देना चाहिए। उन्होंने संसद में प्रधानमंत्री की मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाए और दावा किया कि विपक्ष ऐसे मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगना चाहता है।

अमेरिकी सीनेट में 86-11 से पास हुआ बिल

रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी सीनेट ने रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों वाले विधेयक को 86 के मुकाबले 11 वोटों से मंजूरी दी है।

विधेयक का नाम बदलकर ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ किया गया है। इसका उद्देश्य रूस और ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के साथ-साथ उन देशों को भी प्रभावित करना है, जो रूस से ऊर्जा उत्पाद खरीद रहे हैं।

अमेरिकी सांसदों का तर्क है कि रूस के साथ जारी ऊर्जा व्यापार से मॉस्को को आर्थिक संसाधन मिलते हैं, जिनका इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में किया जा सकता है।

भारत के लिए क्या है चिंता?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता रहा है। यदि अमेरिकी प्रतिबंधों के तहत भारत पर अतिरिक्त टैरिफ या अन्य व्यापारिक कार्रवाई होती है, तो इसका असर दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों के साथ-साथ भारतीय कंपनियों की लागत पर भी पड़ सकता है।

हालांकि, सीनेट से विधेयक पारित होना अंतिम कानून बनने के बराबर नहीं है। इसे आगे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की प्रक्रिया से गुजरना होगा और इसके बाद ही इसके वास्तविक स्वरूप और संभावित प्रभाव को लेकर स्थिति स्पष्ट होगी।

विपक्ष उठा रहा विदेश नीति का मुद्दा

अमेरिकी प्रस्ताव को लेकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल केंद्र सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठा सकते हैं। विपक्ष का जोर इस बात पर है कि भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जुड़े फैसले बाहरी दबाव से प्रभावित हुए बिना लेने चाहिए।

दूसरी ओर, इस मामले में अंतिम स्थिति अमेरिकी विधायी प्रक्रिया और आगे होने वाले कूटनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर करेगी।


बेबाक24 टेक

अमेरिकी सीनेट से पारित यह प्रस्ताव केवल भारत-अमेरिका संबंधों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध वैश्विक ऊर्जा व्यापार, रूस पर आर्थिक दबाव और यूक्रेन युद्ध से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय रणनीति से है। यदि प्रस्ताव आगे कानून का रूप लेता है, तो भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता दोनों महत्वपूर्ण चुनौती बन सकते हैं।



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