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'जेन-ज़ी देश-विरोधी नहीं, उनके सवाल जायज़'; छात्रों के प्रदर्शन पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा बयान

by admin@bebak24.com on | 2026-08-06 20:32:31

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'जेन-ज़ी देश-विरोधी नहीं, उनके सवाल जायज़'; छात्रों के प्रदर्शन पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा बयान

मुंबई: देश भर में जारी छात्र आंदोलनों, जेपीएससी-जेएसएससी और विश्वविद्यालयीय विरोध प्रदर्शनों के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का महत्वपूर्ण बयान सामने आया है। मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने स्पष्ट किया कि नई पीढ़ी का विरोध देश-विरोधी नहीं है और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार के लिए युवाओं से संवाद बेहद जरूरी है।

मोहन भागवत के संबोधन के प्रमुख बिंदु

आरएसएस प्रमुख ने लोकतंत्र, युवा पीढ़ी के दृष्टिकोण और आंदोलन के तरीकों पर विस्तार से अपने विचार रखे:

  • "जेन-ज़ी देश-विरोधी नहीं": मोहन भागवत ने कहा, "अगर जेन-ज़ी (Gen-Z) विरोध-प्रदर्शन कर रही है, तो वे देश-विरोधी नहीं हैं। वे हमारे अपने हैं, हमारी अगली पीढ़ी हैं। उनके साथ बातचीत के साथ-साथ अपनापन महसूस कराने की भी जरूरत है।"

  • शिकायतें जायज़, व्यवस्था में सुधार ज़रूरी: उन्होंने माना कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में जो काम होना चाहिए था, वह नहीं हो पा रहा है। इसी कारण युवाओं में असंतोष है और उनकी शिकायतें पूरी तरह जायज़ हैं।

  • बदलती सोच और सवाल करने का अधिकार: उन्होंने कहा कि पहले की पीढ़ियां बड़ों की बात बिना सवाल किए मान लेती थीं, लेकिन आज की जेन-ज़ी और जेन-अल्फा तर्कसंगत जवाब चाहती हैं। इसे खारिज करने के बजाय संवाद स्थापित करना चाहिए।

'शास्त्रार्थ' और लोकतांत्रिक मर्यादा का संदेश

भागवत ने लोकतंत्र में संवाद और विरोध की मर्यादा को भारत के प्राचीन 'शास्त्रार्थ' की परंपरा से जोड़ा:

  • शास्त्रार्थ की प्रक्रिया: उन्होंने कहा कि जैसे शास्त्रार्थ में 'पूर्व पक्ष' और 'उत्तर पक्ष' के बीच तर्क-वितर्क से सत्य का निर्माण होता है, उसी तरह आज भी विमर्श की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

  • व्यवस्था सुधार हेतु आंदोलन: उन्होंने डॉ. बी.आर. आंबेडकर और संविधान निर्माताओं का हवाला देते हुए कहा कि लोकतंत्र में विरोध का उद्देश्य किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार और सहमति बनाना होना चाहिए, न कि समाज में विभाजन पैदा करना।

बेबाक24 टेक

झारखंड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में परीक्षाओं में धांधली व भर्ती नीतियों के खिलाफ युवाओं के जारी उग्र प्रदर्शनों के बीच मोहन भागवत का यह बयान बेहद प्रासंगिक है। सरकार और प्रशासन को यह स्पष्ट संदेश है कि छात्रों के आंदोलन को दबाने या उन्हें 'उपद्रवी' करार देने के बजाय उनकी वाजिब शिकायतों को सहानभूतिपूर्वक सुना जाए और शिक्षा व परीक्षा तंत्र में ठोस सुधार किए जाएं।



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