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'प्रदर्शन खत्म नहीं हुआ!'... हिरासत की अफवाहों के बीच केरल हाउस के सामने धरने पर बैठे दीपके और गीतांजलि आंग्मो; जेपी नड्डा से 10 मिनट की मुलाकात

by admin@bebak24.com on | 2026-07-20 19:54:26

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'प्रदर्शन खत्म नहीं हुआ!'... हिरासत की अफवाहों के बीच केरल हाउस के सामने धरने पर बैठे दीपके और गीतांजलि आंग्मो; जेपी नड्डा से 10 मिनट की मुलाकात

नई दिल्ली: नीट (NEET) धांधली और शिक्षा सुधारों को लेकर दिल्ली की सड़कों पर छिड़ा संग्राम थमने का नाम नहीं ले रहा है। सोमवार को 'चलो संसद' मार्च के दौरान हुए भारी लाठीचार्ज और आंसू गैस के दंश के बाद, सोशल मीडिया पर उड़ रही अफवाहों को खारिज करते हुए कॉकरोच जनता पार्टी ने एक बड़ा दावा किया है।

सीजेपी ने आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट किया है कि छात्रों का आंदोलन खत्म नहीं हुआ है। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके और सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे अंगमो इस समय दिल्ली के केरल हाउस के सामने सड़क पर ही धरने पर बैठ गए हैं। इससे पहले दीपके को पुलिस हिरासत में लिए जाने की खबरें उड़ी थीं, जिसे दिल्ली पुलिस और खुद सीजेपी ने बाद में महज एक अफवाह बताया।

हिरासत या अफवाह? दिल्ली पुलिस और सीजेपी की स्थिति साफ

सोमवार दोपहर को मार्च के दौरान मची भगदड़ के बाद यह खबर तेजी से फैली कि आंदोलन की अगुवाई कर रहे अभिजीत दीपके को दिल्ली पुलिस ने डिटेन कर लिया है। मामले को तूल पकड़ता देख प्रशासन और पार्टी दोनों को सामने आना पड़ा:

  • दिल्ली पुलिस का खंडन: दिल्ली पुलिस ने आधिकारिक तौर पर 'एक्स' पर लिखा, "सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर गुमराह करने वाली खबरें चल रही हैं कि अभिजीत दीपके को हिरासत में लिया गया है। यह आरोप पूरी तरह झूठे हैं, वे मंच पर ही मौजूद हैं।"

  • सीजेपी का नया स्टैंड: इसके बाद सीजेपी प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि दीपके हिरासत में नहीं हैं। पार्टी ने नया अपडेट जारी करते हुए कहा:

CJP का आधिकारिक पोस्ट: "अभिजीत दीपके, सौरव दास, आशुतोष रांका और गीतांजलि मैम अभी भी जंतर-मंतर क्षेत्र में धरना दे रहे हैं। वे इस समय केरल हाउस के सामने हैं। यह शांतिपूर्ण विरोध खत्म नहीं हो रहा है।"

केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से मिले प्रवक्ता: 2 घंटे का इंतजार, 10 मिनट की बात

सड़कों पर मचे इस कोहराम के बीच सीजेपी के दो शीर्ष प्रवक्ताओं— सौरभ दास और आशुतोष रांका ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के आवास पर उनसे मुलाकात की।

सौरभ दास ने दावा किया कि सरकार ने खुद सुबह आंदोलनकारियों से बातचीत के लिए संपर्क साधा था। उन्होंने बताया:

सौरभ दास का दावा: "आवास पर दो घंटे से अधिक समय तक इंतजार करने के बाद हमारी जेपी नड्डा जी से करीब 10 मिनट की मुलाकात हुई। हमने उन्हें अपनी मांगों का आधिकारिक पत्र सौंप दिया है। उन्होंने हमें भरोसा दिलाया है कि वे इन मांगों पर सरकार के भीतर आंतरिक रूप से गंभीर चर्चा करेंगे।"

दीपके और आइसा ने तोड़ा अनशन, पर वांगचुक अस्पताल में अड़े

इस आंदोलन में रणनीतिक रूप से एक बड़ा बदलाव भी देखा गया है। विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शबाना आज़मी जैसी दिग्गज हस्तियों की अपील के बाद जंतर-मंतर पर एक बड़ा अनशन समाप्त हुआ है:

  • भूख हड़ताल खत्म: सीजेपी फाउंडर अभिजीत दीपके और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन के तीन सदस्यों (नेहा, आमीन और मनीष) ने अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी है। आइसा के ये छात्र पिछले 23 दिनों से लगातार उपवास पर थे।

  • सोनम वांगचुक का स्टैंड: दूसरी तरफ, सफदरजंग अस्पताल में भर्ती सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का 23वें दिन भी अनशन जारी है। उन्होंने अस्पताल में ड्रिप या मुंह से कोई भी लिक्विड (तरल पदार्थ) लेने से मना कर दिया है।

वांगचुक की पत्नी गीतांजलि ने साफ किया है कि यदि विपक्षी या सत्तापक्ष के सांसद अस्पताल जाकर वांगचुक को यह भरोसा दिलाते हैं कि वे संसद के मॉनसून सत्र में शिक्षा की जवाबदेही का मुद्दा उठाएंगे, तो ही वांगचुक अपना अनशन वापस लेंगे।

बेबाक24 टेक

सीजेपी और छात्रों के इस आंदोलन ने लुटियंस दिल्ली को हिलाकर रख दिया है। एक तरफ जहां दिल्ली पुलिस ने धारा 163 (बीएनएसएस) का हवाला देकर मार्च को 'अवैध' घोषित किया और आंसू गैस के गोले छोड़े, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा का आंदोलनकारियों को बातचीत के लिए बुलाना यह साबित करता है कि सरकार इस मुद्दे की तपिश को भांप चुकी है।

बेबाक24 का राजनीतिक विश्लेषण कहता है कि अभिजीत दीपके और आइसा के छात्रों द्वारा भूख हड़ताल खत्म करना और सड़क पर धरने पर बैठ जाना एक सोची-समझी रणनीति है। अनशन से शरीर कमजोर होता है, लेकिन धरने पर बैठकर लंबी लड़ाई लड़ी जा सकती है। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर सरकार भले ही तुरंत तैयार न हो, लेकिन मानसून सत्र के पहले ही दिन जेपी नड्डा के टेबल तक पेपर लीक का मांग पत्र पहुंच जाना छात्रों की पहली बड़ी प्रशासनिक जीत है। अब देखना यह है कि आंतरिक चर्चा के बाद सरकार संसद के भीतर इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है।



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