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'यू-टर्न' या व्यावहारिक कूटनीति? सोनम वांगचुक की शर्तों पर क्यों भड़के एक्टिविस्ट और पत्रकार, क्या आंदोलन 'सेफ एग्जिट' की ओर?

by admin@bebak24.com on | 2026-07-20 19:49:22

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'यू-टर्न' या व्यावहारिक कूटनीति? सोनम वांगचुक की शर्तों पर क्यों भड़के एक्टिविस्ट और पत्रकार, क्या आंदोलन 'सेफ एग्जिट' की ओर?

नई दिल्ली: नीट पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार के नाम पर 23 दिनों से अन्न-जल त्यागे सफदरजंग अस्पताल में भर्ती सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आंदोलन में आज एक नया और विवादित मोड़ आ गया है। सोमवार सुबह वांगचुक द्वारा अनशन खत्म करने के लिए जारी की गई 3 शर्तों ने प्रदर्शनकारियों के बीच तो नई ऊर्जा भरी है, लेकिन देश के बौद्धिक वर्ग, वरिष्ठ पत्रकारों और एक्टिविस्टों के बीच गंभीर संदेह और तीखे सवालों की झड़ी लगा दी है।

आलोचकों का सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर यह पूरा आंदोलन शुरू हुआ था, वांगचुक की नई शर्तों से अचानक वह मुख्य मांग पूरी तरह गायब क्यों हो गई?


क्यों उठ रहे हैं सवाल? आलोचना के 3 मुख्य केंद्र बिंदु

सोनम वांगचुक की शर्तें सार्वजनिक होते ही सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया में हलचल तेज हो गई है। बुद्धिजीवियों और पत्रकारों ने उनके इस कदम को 'मोदी सरकार की राजनीतिक जीत' और 'आंदोलन से पीछे हटना' करार दिया है:

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर रहस्यमयी चुप्पी

वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और सोनम वांगचुक का यह 23 दिवसीय अनशन मूल रूप से शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की जिद पर अड़ा था। लेकिन नई शर्तों में केवल "सरकार विफलताओं की जिम्मेदारी ले" या "विपक्षी सांसद अस्पताल आकर मुद्दा उठाने का आश्वासन दें" जैसे ढीले विकल्प रखे गए हैं।

सरकार को 'क्लीन चिट' और विपक्ष पर सारा ठीकरा?

चर्चित एकेडेमिक और लेखक अपूर्वानंद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (ट्विटर) पर अपनी गहरी निराशा व्यक्त करते हुए लिखा:

अपूर्वानंद का ट्वीट: "कैसी निराशाजनक बात है। अब गेंद सरकार के पाले से निकलकर विपक्ष के पाले में पहुंच गई है। वे (सोनम वांगचुक) विपक्षी नेताओं से अपील कर रहे हैं कि वे उनके पास आकर आश्वासन दें कि संसद के मौजूदा सत्र में शिक्षा का मुद्दा मजबूती से उठाया जाएगा।"

कॉकरोच जनता पार्टी से दूरी और 'राज्यपाल' का रहस्य

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने वांगचुक के इरादों और उनके इस फैसले के पीछे की कड़ियों पर तीखे सवाल दागे हैं:

  • क्या सोनम वांगचुक ने खुद को सीजेपी के इस आंदोलन से अलग कर लिया है?

  • क्या उन्होंने अनशन तोड़ने की इतनी आसान शर्तें रखने से पहले आंदोलन के बाकी साथियों को भरोसे में लिया था?

  • वांगचुक का यह बयान कि "राज्यपाल ने उन्हें अभिजीत दीपके से मिलने के लिए विवश किया," भारी संदेह पैदा करता है। आखिर राज्यपाल के क्या स्वार्थ थे और क्या सरकार ने वांगचुक की किसी मजबूरी का फायदा उठाया?

'सम्मानजनक रास्ता' या 'शहादत' से बचने की मजबूरी? विशेषज्ञों का गणित

इस पूरे मामले पर देश के दो दिग्गजों ने वांगचुक के कदम का बचाव भी किया है और इसे एक व्यावहारिक रणनीति बताया है:

                  ┌────────────────────────────────────────┐
                  │   सोनम वांगचुक के सामने दो ही रास्ते   │
                  └───────────────────┬────────────────────┘
                                      │
             ┌────────────────────────┴────────────────────────┐
             ▼                                                 ▼
┌──────────────────────────┐                      ┌──────────────────────────┐
│  रास्ता 1: आमरण अनशन     │                      │   रास्ता 2: भूख हड़ताल   │
│  जारी रखना और प्रो. जीडी │                      │   तोड़ना (एक सम्मानजनक   │
│  अग्रवाल की तरह शहीद होना│                      │   रास्ता तलाश कर)        │
└──────────────────────────┘                      └──────────────────────────┘

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शरद गुप्ता ने 'बेबाक न्यूज हिन्दी' से बात करते हुए कहा कि लद्दाख के इस सोशल एक्टिविस्ट के पास बेहद सीमित विकल्प हैं:

शरद गुप्ता का विश्लेषण: "सोनम वांगचुक के सामने दो ही रास्ते थे। पहला, वे आमरण अनशन जारी रखें और 2018 में गंगा सफाई के लिए 111 दिन अनशन करके प्राण त्यागने वाले 86 वर्षीय प्रो. जीडी अग्रवाल (स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद) की तरह शहीद होकर बाद में भुला दिए जाएं। दूसरा और व्यावहारिक रास्ता यह है कि वे अपनी भूख हड़ताल तोड़ें, जिसके लिए उन्हें एक सम्मानजनक रास्ता चाहिए था। जब सरकार बात करने को तैयार नहीं है, तो विपक्ष के जरिए संसद में इस गूंज को पहुंचाना ही उनके लिए सबसे संतोषजनक और सुरक्षित एग्जिट (निकास) हो सकता है।"

शरद गुप्ता ने यह भी याद दिलाया कि पिछली बार लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग के दौरान सरकार ने वांगचुक को हिरासत में ले लिया था, इसलिए उन्हें इस बार भी लंबी जेल या स्वास्थ्य के पूरी तरह गिरने की आशंका है।

'यह मील का पत्थर है, आंदोलन खत्म नहीं हुआ' — योगेंद्र यादव

दूसरी तरफ, प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव इस आलोचना से पूरी तरह असहमत हैं। उन्होंने पत्रकार स्मिता शर्मा से बात करते हुए इस आंदोलन का पुरजोर बचाव किया:

  • 50 साल बाद बड़ी जागृति: योगेंद्र यादव का मानना है कि लगभग 50 सालों के बाद देश का युवा शिक्षा और रोजगार के सवाल पर इस तरह सड़कों पर एकजुट हुआ है। यह आंदोलन भारतीय राजनीति का रुख मोड़ने में 'मील का पत्थर' साबित होगा।

  • अनशन टूटना बनाम आंदोलन खत्म होना: उन्होंने स्पष्ट किया कि वांगचुक ने भूख हड़ताल खत्म करने की बात कही है, आंदोलन खत्म करने की नहीं। उनके लिखित बयान का मतलब यह है कि जिम्मेदारी तय हो, चाहे वह इस्तीफे के रूप में हो या संसद में बहस के रूप में।

इसी बीच, आइसा (AISA) के तीन अनशनकारियों (नेहा, आमीन और मनीष) से मिलने पहुंचीं दिग्गज अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आज़मी ने भी छात्रों के इस 23 दिनों के संघर्ष को आगे की राजनीति के लिए एक नई और सही दिशा बताया है।

बेबाक24 टेक

सोनम वांगचुक की इन नई शर्तों को 'कायरता' या 'पीछे हटना' कहना उनके साथ सरासर नाइंसाफी होगी। यह सच है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग का शर्तों में न होना आंदोलन की धार को थोड़ा कुंद करता दिखता है और पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी की यह बात सही लगती है कि यह मोदी सरकार के लिए एक बड़ी 'राजनीतिक राहत' है। लेकिन हमें जमीनी हकीकत को भी नहीं भूलना चाहिए। एक ऐसे दौर में जहां सरकारें आंदोलनों को कुचलने और अनशनकारियों की सुध न लेकर उन्हें तड़पने के लिए छोड़ देने की रणनीति अपनाती हैं (जैसा प्रो. जीडी अग्रवाल के मामले में हुआ था), वहां अपनी जान गंवाने से बेहतर है कि जीवित रहकर लड़ाई को संसद के पटल तक पहुंचाया जाए।

बेबाक24 का रणनीतिक विश्लेषण कहता है कि वांगचुक ने लद्दाख आंदोलन से सबक सीखा है। वे जानते हैं कि अस्पताल के एकांत पहरे में भूखे रहकर शहीद हो जाने से बेहतर है कि विपक्ष के 200 से अधिक सांसदों को इस मुद्दे पर कमिटेड कर दिया जाए, ताकि आज से शुरू हो रहे मानसून सत्र में सरकार को चैन की सांस न लेने दी जाए। आज जंतर-मंतर पर उमड़ा युवाओं का सैलाब और पुलिस की लाठियां गवाह हैं कि मुद्दा जनता के दिलों में बैठ चुका है। धर्मेंद्र प्रधान की कुर्सी रहे या जाए, 'शिक्षा माफिया' के खिलाफ देश के युवाओं की यह वैचारिक जीत सुनिश्चित हो चुकी है।



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