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TMC में बड़ी टूट: 20 बागी सांसदों का त्रिपुरा की NCP में विलय, NDA को समर्थन

by on | 2026-06-14 23:27:40

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TMC में बड़ी टूट: 20 बागी सांसदों का त्रिपुरा की NCP में विलय, NDA को समर्थन

नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) संसद के भीतर दो-फाड़ हो गई है। दिल्ली में रविवार (14 जून) को हुए एक बेहद नाटकीय और बड़े राजनीतिक घटनाक्रम में टीएमसी के बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ओम बिरला से मुलाकात कर आधिकारिक रूप से विभाजन का एलान कर दिया।

बागी गुट की अगुवाई कर रहीं सांसद काकोली घोष दस्तीदार और वरिष्ठ नेता सुदीप बंदोपाध्याय ने साफ किया कि दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की कानूनी अड़चनों से बचने के लिए उनके गुट ने त्रिपुरा आधारित क्षेत्रीय दल 'नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी' (NCP) में विलय करने का फैसला किया है। यह बागी गुट अब केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को अपना समर्थन सौंपेगा।

दलबदल कानून से बचने की रणनीति: 28 में से 20 सांसद बागी

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के आवास पर हुई हाई-प्रोफाइल मुलाकात के बाद बागी सांसदों ने अपनी रणनीति का खुलासा किया:

  • दो-तिहाई का आंकड़ा पार: काकोली घोष दस्तीदार ने मीडिया को बताया कि लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने अलग बैठने की व्यवस्था के लिए स्पीकर को पत्र सौंपा है। यह संख्या कुल संख्या का दो-तिहाई (2/3) से अधिक है, जिससे उनकी सदस्यता पर कोई आंच नहीं आएगी।

  • रणनीति बैठक: स्पीकर से मिलने से पहले इन बागी सांसदों ने भाजपा के पश्चिम बंगाल प्रभारी और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के दिल्ली आवास पर एक लंबी सीक्रेट मीटिंग की, जिसमें सायोनी घोष, शताब्दी रॉय और माला रॉय भी शामिल थीं।

जुलाई में असली 'तृणमूल' नाम पर ठोकेंगे दावा — सुदीप बंदोपाध्याय

टीएमसी के वरिष्ठ नेता सुदीप बंदोपाध्याय ने इस कानूनी और राजनीतिक विलय की पूरी रूपरेखा समझाते हुए कहा:

"नियम के मुताबिक, जब आप दो-तिहाई बहुमत के साथ अलग होते हैं, तो पहले ही दिन मूल पार्टी का नाम नहीं मांग सकते। इसलिए तकनीकी रूप से हम पहले 'नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी' (क्षेत्रीय दल) में विलय कर रहे हैं। इसके बाद, जुलाई में हम लोकसभा अध्यक्ष और अदालत के सामने 'तृणमूल' नाम और सिंबल पर अपना दावा ठोकेंगे क्योंकि असली बहुमत हमारे पास है।"

बंदोपाध्याय ने यह भी पुष्टि की कि स्पीकर ओम बिरला ने पत्र में मौजूद सभी 20 सांसदों के हस्ताक्षरों का व्यक्तिगत रूप से सत्यापन (Verification) कर लिया है। बिहार के नेताओं (कीर्ति आजाद और शत्रुघ्न सिन्हा) की भूमिका पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि 'बिहार के लोग बंगाल की पार्टी को ज्यादा दिनों तक समर्थन नहीं दे सकते।'

क्यों चुनी गई त्रिपुरा की 'नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी'?

'नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी' (NCP) मुख्य रूप से त्रिपुरा, असम और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में सक्रिय एक छोटी और कम चर्चित क्षेत्रीय पार्टी है। टीएमसी के बागियों ने बहुत सोच-समझकर इस दल को चुना है। संसद के नियमों के अनुसार, सदन में सीधे किसी स्वतंत्र 'नए गुट' को मान्यता मिलने पर तकनीकी दिक्कतें आ सकती हैं, लेकिन किसी पंजीकृत मूल दल के साथ विलय करने पर दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की तलवार पूरी तरह हट जाती है। इस कानूनी कवच को हासिल करने के बाद यह पूरा गुट एनडीए में शामिल हो जाएगा।

ममता बनर्जी कैंप का पलटवार: सदस्यता रद्द करने की मांग

कोलकाता से लेकर दिल्ली तक मचे इस हड़कंप के बीच ममता बनर्जी के वफादार खेमे ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी है:

  • अभिषेक बनर्जी का पत्र: टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने तुरंत लोकसभा अध्यक्ष को एक पत्र भेजकर बागियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की।

  • स्पीकर को सौंपी शिकायत: टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद और सागरिका घोष ने व्यक्तिगत रूप से स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात कर इस पत्र को सौंपा और मांग की कि पाला बदलने वाले इन सांसदों की लोकसभा सदस्यता को तुरंत अमान्य/रद्द (Disqualify) किया जाए।

Bebak24 टेक

यह भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे बड़े विभाजनों में से एक है। ममता बनर्जी के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक और कूटनीतिक झटका है, क्योंकि संसद के भीतर उनकी पार्टी की ताकत अब मात्र 8 सांसदों तक सिमट कर रह गई है।

तकनीकी और कानूनी दृष्टिकोण से सुदीप बंदोपाध्याय और काकोली घोष का यह कदम बेहद सधा हुआ है। दो-तिहाई सांसदों (20/28) के हस्ताक्षर होने के कारण दलबदल विरोधी कानून के तहत स्पीकर के लिए इन्हें अयोग्य ठहराना बेहद मुश्किल होगा। त्रिपुरा की एनसीपी का इस्तेमाल केवल एक 'विधिक लॉन्चपैड' (Legal Launchpad) के रूप में किया गया है ताकि अंततः भाजपा और एनडीए को मजबूती दी जा सके। पश्चिम बंगाल में सरकार गंवाने के बाद अब दिल्ली की संसद में भी ममता बनर्जी पूरी तरह बैकफुट पर आ गई हैं, और असली 'तृणमूल' ब्रांड के स्वामित्व की यह जंग अब चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के गलियारों तक खिंचना तय है।



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