ब्रेकिंग न्यूज़
सोमनाथ में श्रद्धा और शक्ति का सैलाब: पीएम मोदी ने डमरू बजाकर और त्रिशूल थामकर किया 'शौर्य यात्रा' का शंखनाद
राजनीति राजनीति

उत्तर प्रदेश: जीरो टॉलरेंस के दावों के बीच 'खाकी, खादी और जरायम' का यह कैसा शिलान्यास?

by on | 2026-06-12 13:03:36

Share: Facebook | Twitter | WhatsApp | LinkedIn Visits: 3104


उत्तर प्रदेश: जीरो टॉलरेंस के दावों के बीच 'खाकी, खादी और जरायम' का यह कैसा शिलान्यास?


​उत्तर प्रदेश में एक तरफ जहां गाजीपुर से गाजियाबाद तक माफियाओं के खिलाफ "जीरो टॉलरेंस" की मुनादी पीटी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर व्यवस्था का एक ऐसा चेहरा सामने आया है जो दावों और हकीकत के बीच की खाई को उजागर करता है। मीरजापुर के जिगना थाना क्षेत्र के नेगुरा रिबई सिंह ग्राम में एक नई पुलिस चौकी का शिलान्यास होना था, लेकिन यह आयोजन कानून के इकबाल की स्थापना के बजाय व्यवस्था की घोर लापरवाही और लाचारी का प्रतीक बन गया।

​कानून की रक्षक 'खाकी' और नीति नियंता 'खादी' जब एक ही मंच पर एक घोषित अपराधी और गैंगस्टर के साथ सुशोभित हों, तो जनता में क्या संदेश जाता है?

​माननीय जज और उच्चाधिकारियों के बीच 'गैंगस्टर' की ससम्मान मौजूदगी

​यह कोई साधारण ग्रामीण सभा नहीं थी। मंच पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की माननीय न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थीं। उनकी गरिमामयी उपस्थिति में मीरजापुर के जिलाधिकारी (DM) पवन कुमार गंगवार और पुलिस अधीक्षक (SP) अपर्णा रजत कौशिक सहित जिले का पूरा प्रशासनिक और पुलिस अमला मौजूद था।

​लेकिन इस अति-विशिष्ट और संवेदनशील माहौल में सभी को चौंकाते हुए कई गंभीर मामलों का आरोपी गैंगस्टर अवधराज सिंह उर्फ पप्पू न केवल वहां घूमता रहा, बल्कि प्रशासनिक सुरक्षा चक्र को धता बताकर अधिकारियों के ठीक बीच ससम्मान मौजूद रहा।

बड़ा सवाल: जिस पुलिस को क्षेत्र में कानून का राज स्थापित करने के लिए चौकी की नींव रखनी थी, उसी पुलिस के खुफिया तंत्र (LIU) और सुरक्षा दस्ते को यह भनक तक नहीं लगी कि देश की उच्च न्यायपालिका और जिले के सर्वोच्च अधिकारी के ठीक बगल में एक वांछित मानसिकता का अपराधी खड़ा है?


​प्रेस विज्ञप्ति से नाम गायब, मगर तस्वीरों से सच साफ

​मामले को और अधिक संदिग्ध पुलिस की उस आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति ने बनाया, जो कार्यक्रम के बाद जारी की गई। इस विज्ञप्ति में वीआईपी अतिथियों से लेकर स्थानीय ग्रामीणों तक का जिक्र था, लेकिन उस कुख्यात चेहरे का नाम पूरी तरह गायब था।

​यह साफ तौर पर पुलिस प्रशासन द्वारा अपनी नाकामी और चूक पर पर्दा डालने की एक नाकाम कोशिश थी। यदि यह कोई सामान्य चूक थी, तो पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था इतनी ढीली क्यों थी कि एक गैंगस्टर इतने संवेदनशील कार्यक्रम के केंद्र तक पहुंच गया? और यदि यह जानबूझकर दी गई ढील थी, तो यह अपराधियों और रसूखदारों के बीच के उस गठजोड़ की तस्दीक करती है, जिस पर आए दिन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप लगते रहते हैं।

​सत्ता का संरक्षण या कानून का 'बकैया सिस्टम'?

​यह घटना केवल एक स्थानीय लापरवाही नहीं है, बल्कि यह पूर्वांचल में जरायम और सत्ता के उस पुराने ढर्रे को फिर से रेखांकित करती है, जिसे मिटाने का दम भरा जाता रहा है। जनमानस में उठ रहे तीखे सवालों और प्रतिक्रियाओं को देखें, तो यह गुस्सा बेवजह नहीं है:

  • चुनिंदा कार्रवाई के आरोप: आलोचक और विपक्षी दल लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि एक तरफ अपराधियों के खिलाफ बुलडोजर की कार्रवाई का ढोल पीटा जाता है, तो दूसरी तरफ रसूखदार पृष्ठभूमि वाले चेहरे सत्ता और व्यवस्था के समानांतर चलते दिखाई देते हैं।
  • अपहरण के सिंडिकेट से लेकर एमएलसी तक का सफर: कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद एमएलसी श्याम नारायण सिंह उर्फ विनीत सिंह की पृष्ठभूमि खुद विवादों से परे नहीं है। तीन राज्यों में अपहरण और फिरौती जैसे २५ से अधिक गंभीर मामलों के इतिहास और उद्योगपतियों के बच्चों के अपहरण जैसे संगीन आरोपों के बावजूद वे आज विधान परिषद के माननीय सदस्य हैं। जब ऐसे रसूखदार चेहरों की संगति में दूसरे गैंगस्टर भी मंच साझा करने लगें, तो "अपराध पर कालिख पोतने" जैसे तीखे राजनीतिक तंज लाजिमी हो जाते हैं।
  • पूर्वांचल में बाहुबल का पुराना ढर्रा: स्थानीय स्तर पर जनता आज भी सवाल करती है कि क्या केवल चेहरे और दल बदले हैं, व्यवस्था नहीं? बलिया से लेकर गाजीपुर, आजमगढ़, वाराणसी और जौनपुर तक बाहुबलियों और उनके परिजनों का राजनीतिक वर्चस्व आज भी जस का तस बना हुआ है।

​कानून के इकबाल पर गहरी चोट

​एक नई पुलिस चौकी की स्थापना इसलिए की जाती है ताकि आम नागरिक खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें और अपराधियों में भय हो। लेकिन जब उस चौकी की पहली ईंट ही अपराधियों की छांव में रखी जाए, तो न्याय और सुरक्षा की उम्मीदें बेमानी लगने लगती हैं।

​इलाहाबाद हाईकोर्ट की जज और जिले के आला अधिकारियों के सामने हुआ यह वाकया उत्तर प्रदेश शासन की छवि पर एक गहरा दाग है। इस लापरवाही पर केवल पर्दा डालना काफी नहीं होगा; शासन को यह तय करना होगा कि क्या वाकई सूबे में "अपराधी जेल में या प्रदेश के बाहर" हैं, या फिर वे आज भी खाकी की नाक के नीचे व्यवस्था को मुंह चिढ़ा रहे हैं।



Search
Recent News
Top Trending
Most Popular

Leave a Comment