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तबादलों की मोहलत या भ्रष्टाचार को ढील? जब रक्षक ही संज्ञान लेकर सो जाएं, तो किसान कहां जाए!

by on | 2026-06-07 18:28:37

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तबादलों की मोहलत या भ्रष्टाचार को ढील? जब रक्षक ही संज्ञान लेकर सो जाएं, तो किसान कहां जाए!


वाराणसी । ​उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बड़ा फरमान जारी करते हुए कृषि विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादलों की डेडलाइन को बढ़ाकर 10 जून 2026 कर दिया है। शासन का तर्क है कि इससे प्रशासनिक कार्यों में गति आएगी, लंबित प्रस्तावों का निपटारा होगा और खरीफ सीजन में किसानों को बेहतर सेवाएं मिलेंगी। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ कुर्सियां बदलने से कृषि विभाग की सड़ चुकी व्यवस्था में कोई सुधार आएगा? या फिर यह सिर्फ कागजी खानापूर्ति है?

​तबादलों का खेल और जमीनी हकीकत

​शासन के गलियारों में हलचल तेज है। फाइलें एक मेज से दूसरी मेज पर दौड़ रही हैं ताकि 10 जून तक मनचाही पोस्टिंग और तबादलों का खेल पूरा किया जा सके। सरकार कह रही है कि इससे खरीफ फसलों के समय बीज, खाद और अनुदान का काम सुचारू रूप से चलेगा।

​लेकिन 'खबर दो बेबाक 24' की ग्राउंड रिपोर्ट कुछ और ही हकीकत बयां करती है। सरकार की सोच और नीतियां चाहे जो भी हों, धरातल पर अन्नदाता आज भी खून के आंसू रो रहा है। विभाग में पारदर्शिता के दावों के बीच भ्रष्टाचार और कालाबाजारी का धंधा खुलेआम फल-फूल रहा है।

​गाजीपुर में खाद की कालाबाजारी: जब बड़े अधिकारी ही मौन हैं!

​तबादलों की इस राहत के बीच सबसे बड़ा और तीखा सवाल यह है कि कृषि विभाग में फैले इस संस्थागत भ्रष्टाचार पर नकेल कब कसेगी?

  • महंगे दामों की मार: गाजीपुर सहित प्रदेश के कई जिलों में DAP और यूरिया की कालाबाजारी चरम पर है। रबी और खरीफ के हर सीजन में किसानों को मजबूरी में निर्धारित रेट से कहीं अधिक ऊंचे दामों पर खाद खरीदनी पड़ती है। अक्टूबर-नवंबर के महीनों में जब खाद की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब सोसायटियों से खाद गायब हो जाती है और प्राइवेट दुकानों पर ऊंचे दामों पर सरेआम बेची जाती है।
  • सबको खबर, पर कार्रवाई सिफर: सबसे शर्मनाक बात यह है कि इस पूरी लूट की जानकारी नीचे से लेकर ऊपर तक सबको है। जिला कृषि अधिकारी से लेकर प्रदेश के विपणन (Marketing) अधिकारी आशुतोष कुमार मिश्रा और खुद सूबे के कृषि मंत्री तक के संज्ञान में यह मामला डाला जा चुका है।
  • बेबाक सवाल: जब विभाग के इतने बड़े कर्णधारों को खुद किसानों ने अपनी आपबीती और ऊंचे दामों पर खाद खरीदने की मजबूरी बताई, उसके बावजूद कार्रवाई के नाम पर केवल ढाक के तीन पात ही क्यों रहे? जब जिम्मेदार अधिकारी सब कुछ जानकर भी आंखें मूंदे बैठे हैं, तो आम किसान किसके भरोसे खेती करे?


    ​तबादला नीति बनाम किसान की नियति

    ​10 जून तक बाबू और अफसर अपनी पसंद के जिलों में ट्रांसफर कराकर सेट हो जाएंगे। लेकिन क्या गारंटी है कि नई कुर्सी पर बैठने वाला अधिकारी गाजीपुर या किसी अन्य जिले के किसानों को तय दाम पर DAP दिला पाएगा?

    'बेबाक 24' का सीधा स्टैंड:

    प्रशासनिक सुधार के नाम पर समय-सीमा बढ़ाना प्रशासनिक अधिकारियों के लिए राहत भरा कदम हो सकता है, लेकिन जब तक खाद-बीज की कालाबाजारी करने वाले सिंडिकेट को नहीं तोड़ा जाता और संज्ञान लेकर बैठे बड़े अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक ये तबादले सिर्फ एक कॉस्मेटिक बदलाव बनकर रह जाएंगे। किसान को राहत तारीखें बदलने से नहीं, बल्कि खाद की बोरी सही दाम पर मिलने से मिलेगी!



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