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उर्दू शायरी का चमकता सितारा बुझा: पद्मश्री से सम्मानित मशहूर शायर बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन

by on | 2026-05-29 07:20:20

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उर्दू शायरी का चमकता सितारा बुझा: पद्मश्री से सम्मानित मशहूर शायर बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन


वाराणसी/नई दिल्ली:

उर्दू अदब के आसमान का एक बेहद रोशन सितारा हमेशा के लिए रुखसत हो गया। आधुनिक गजल के उस्ताद और पद्मश्री से सम्मानित मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का लंबी बीमारी के बाद 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन की खबर से देश-दुनिया में फैले उनके लाखों प्रशंसकों और साहित्यानुरागियों में शोक की लहर दौड़ गई है।

साधारण शब्दों में असाधारण बात कहने के थे फनकार

15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में जन्मे बशीर बद्र ने उर्दू शायरी को पारंपरिक और क्लिष्ट (कठिन) शब्दों के दायरे से बाहर निकालकर आम आदमी की जुबान से जोड़ा। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से अपनी उच्च शिक्षा और पीएचडी पूरी करने के बाद उन्होंने वहां उर्दू के प्रोफेसर के रूप में भी सेवाएं दीं।

​गजल में रोजमर्रा के बोलचाल के शब्दों का सहज इस्तेमाल उनकी सबसे बड़ी खासियत थी। साहित्य जगत में उनके इसी अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा 'पदमश्री' से नवाजा गया था। उनकी लिखी प्रसिद्ध किताबों में 'इमकान', 'आहटें', 'कुल्लियात-ए-बशीर बद्र' और 'उजाले अपनी यादों के' शामिल हैं, जो आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेंगी।

"आज उर्दू भाषा थोड़ी कमजोर हो गई" - जावेद अख्तर

​बशीर बद्र के निधन पर दुख व्यक्त करते हुए देश के प्रसिद्ध साहित्यकार और गीतकार जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर भावुक पोस्ट साझा की। उन्होंने लिखा—

​"आज हमारी उर्दू भाषा थोड़ी कमजोर हो गई है। बेहद मधुर कवि बशीर बद्र हमेशा के लिए हमारे बीच से चले गए हैं। यह कवि और उनकी कविताएं हमारी स्मृतियों में हमेशा जीवित रहेंगी।"


जब शिमला समझौते में गूंजा बशीर बद्र का शेर

​बशीर बद्र की लेखनी में न केवल इश्क और जिंदगी का फलसफा था, बल्कि देश के समसामयिक हालातों और इतिहास की भी गहरी समझ थी। भारत के बंटवारे के दर्द को उन्होंने अपनी शायरी में बखूबी पिरोया था।

​इतिहास के पन्नों में दर्ज एक घटना के अनुसार, शिमला समझौते के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के सामने बशीर बद्र का एक बेहद मशहूर शेर पढ़ा था, जिसने दोनों देशों के कूटनीतिक गलियारों में गहरा असर छोड़ा था:

"दुश्मनी जमके करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे,

जब कभी हम दोस्त बन जाएं तो शर्मिन्दा ना हों।"


अमर हो गए बशीर साहब के ये सदाबहार शेर

​बशीर बद्र आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके लिखे ये शेर हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगे:

  • "मुसाफिर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी, किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।"
  • "उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।"
  • "कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फासले से मिला करो।"
  • "दुश्मनों के साथ भी मेरे ताल्लुक अच्छे हैं, मेरी फितरत में नफरत का कोई काम नहीं।"
  • "सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा, इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जाएगा।"

​बशीर बद्र का जाना उर्दू अदब के एक स्वर्णिम युग का अंत है, जिसकी भरपाई नामुमकिन है।



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