by on | 2026-05-24 14:15:15
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अलीगढ़/वाराणसी:
कहते हैं डॉक्टर भगवान का रूप होता है, लेकिन जब वही 'भगवान' चंद रुपयों और घोर लापरवाही के फेर में किसी हंसते-खेलते परिवार को तबाह कर दे, तो उसे आप क्या कहेंगे? उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से मेडिकल जगत को शर्मसार कर देने वाला एक ऐसा ही दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक सर्जन की अंधाधुंध लापरवाही ने एक महिला की जान ले ली। इस ऐतिहासिक और आंखें खोल देने वाले मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने कड़ा रुख अपनाते हुए आरोपी डॉक्टर पर 2 करोड़ रुपये का भारी-भरकम जुर्माना ठोका है।
पूरा मामला साल 2012 का है। अलीगढ़ की रहने वाली एक महिला को पेट में असहनीय दर्द उठा। परिजन उन्हें इलाज के लिए शहर के 'आशीर्वाद नर्सिंग होम' ले गए। वहां तैनात डॉक्टर ने तमाम जांच रिपोर्ट देखने के बाद दावा किया कि महिला की दाहिनी (Right) किडनी पूरी तरह खराब हो चुकी है और इसे फौरन ऑपरेशन करके बाहर निकालना होगा। डॉक्टरों की बात को 'अंतिम सच' मानकर डरे हुए परिजनों ने महिला को अस्पताल में भर्ती करा दिया।
6 मई 2012 को ऑपरेशन थियेटर का दरवाजा खुला और बंद हुआ। डॉक्टर बाहर आए और कहा कि ऑपरेशन सफल रहा। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह चिकित्सा इतिहास का सबसे काला अध्याय बन गया।
ऑपरेशन के बाद महिला को डायलिसिस पर रख दिया गया, लेकिन उनकी तकलीफ कम होने के बजाय दिन-ब-दिन और भयावह होती चली गई। जब दर्द बर्दाश्त से बाहर हो गया, तो बदहवास परिजन मरीज को लेकर दूसरे बड़े अस्पताल भागे। वहां जब महिला का दोबारा सीटी स्कैन और उच्च स्तरीय टेस्ट हुए, तो डॉक्टरों के पैरों तले जमीन खिसक गई।
सच यह था कि जिस खराब दाहिनी किडनी को निकाला जाना था, वह शरीर के भीतर जस की तस सड़ रही थी। और डॉक्टर साहब ने अपनी 'महान सूझबूझ' से महिला की शरीर में बची एकमात्र स्वस्थ 'बाईं (Left) किडनी' काटकर बाहर फेंक दी थी!
इस भयंकर और आपराधिक लापरवाही का नतीजा यह हुआ कि महिला के शरीर में अब एक भी काम करने वाली किडनी नहीं बची थी। एक अच्छी किडनी डॉक्टर की भेंट चढ़ चुकी थी और दूसरी पहले से ही डैमेज थी। दो साल तक वह मां, वह पत्नी बिस्तर पर तड़पती रही, जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ती रही। आखिरकार, खून में पोटेशियम की अत्यधिक मात्रा बढ़ने और लो ब्लड शुगर के कारण शरीर ने जवाब दे दिया और महिला ने दम तोड़ दिया।
जब यह मामला कानूनी चौखट और उपभोक्ता फोरम तक पहुंचा, तो डॉक्टर ने खुद को बचाने के लिए अजीबोगरीब पैंतरेबाजी शुरू कर दी। डॉक्टर के वकीलों ने कोर्ट में दलील दी कि "दाहिनी तरफ से चीरा लगाकर बाईं किडनी को निकालना तकनीकी रूप से मुमकिन ही नहीं है, इसलिए आरोप झूठे हैं।"
लेकिन कानून की आंखें बंद नहीं थीं। उपभोक्ता अदालत ने डॉक्टर के इन कुतर्कों को सिरे से खारिज करते हुए पूछा कि "जब ऑपरेशन से पहले की अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन रिपोर्ट में बाईं किडनी बिल्कुल चंगा और स्वस्थ थी, तो उसे छूने की नौबत ही क्यों आई?" कोर्ट ने इसे सीधे तौर पर 'मानवीय संकट और घोर लापरवाही' करार दिया।
इस मामले में सरकारी डॉक्टरों के मेडिकल बोर्ड ने भी डॉक्टर को ही दोषी पाया था। उत्तर प्रदेश मेडिकल काउंसिल और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया पहले ही डॉक्टर का लाइसेंस 2 साल के लिए सस्पेंड कर उसका नाम रजिस्टर से हटा चुकी हैं।
अब उपभोक्ता आयोग ने पीड़ित परिवार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बेहद भावुक और सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा:
"एक मां, एक पत्नी और गृहिणी का जाना किसी भी परिवार के लिए एक ऐसा अपूरणीय नुकसान है, जिसकी भरपाई दुनिया की कोई भी दौलत या मुआवजा नहीं कर सकती। अगर डॉक्टर ने यह भयंकर भूल न की होती, तो वह महिला आज अपने बच्चों के बीच जिंदा होती।"
मुआवजे का पूरा गणित:
बेबाक 24 का नजरिया:
यह फैसला देश के उन तमाम डॉक्टरों और कॉरपोरेट अस्पतालों के मुंह पर करारा तमाचा है जो मरीजों को सिर्फ एक 'नंबर' या 'कमोडिटी' समझते हैं। पैसे शायद उस मां को वापस न ला पाएं, लेकिन यह ऐतिहासिक जुर्माना चिकित्सा जगत में लापरवाही बरतने वाले सफेदपोशों के मन में कानून का खौफ जरूर पैदा करेगा।
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