by on | 2026-05-23 11:52:28
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santosh rai
‘उपर से ठाट-बाट, नीचे रमरेखा घाट’...
शेरपुर। इतिहास के पन्नों को पलटिए तो अंग्रेजी गजेटियर गवाही देते हैं कि यह धरती शूरवीरों की है, शौर्य की है। लेकिन आज का कड़वा सच यह है कि आजादी के बाद से ही शेरपुर अपने ही अंदर बैठे ‘सफेदपोश अंग्रेजों’ से छला जा रहा है। जिन जनप्रतिनिधियों को जनता ने विकास की कमान सौंपी, उन्होंने शेरपुर, शेरपुर खुर्द और अभागा सेमरा जैसे इलाकों को बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर धकेल दिया।
आज जमीनी हकीकत यह है कि सरकारी फाइलों और पंचायत सचिवालय की चकाचौंध के पीछे बदहाली का ऐसा कीचड़ है, जिसमें आम जनता बजबजा रही है।
जमीन का खेल: नक्शे में कहीं, जमीन पर कहीं!
शेरपुर के दीयारे (बाढ़ क्षेत्र) में गरीबों के हक पर डाका डालना तो जैसे पुराना दस्तूर बन चुका है।
गायब सीमाएं: खेतों की मेड़ जमीन पर कहीं और है, और सरकारी नक्शे में कहीं और।
अंधेरे में हिस्सेदार: छोटे हिस्सेदारों को आज तक पता ही नहीं चल पाया कि उनकी पुश्तैनी जमीन असल में है कहां? ताकतवरों के रसूख के आगे छोटे किसान बेबस हैं।
अस्पताल बेहाल, पशु चिकित्सालय का अस्तित्व साफ
स्वास्थ्य के नाम पर यहां सिर्फ कागजी खानापूर्ति है:
लापता इलाज: मुख्य अस्पताल खुद बीमार और बेहाल पड़ा है।
लुप्त हुआ आयुर्वेद: जो आयुर्वेदिक हॉस्पिटल कभी लोगों का सहारा था, वह अब पूरी तरह लुप्त हो चुका है।
पशुओं की सुध लेने वाला कोई नहीं: पशु चिकित्सालय का अस्तित्व ही खत्म हो चुका है, जिससे किसान और पशुपालक दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
सहकारी सोसाइटी: खाद-बीज के लिए बनी सहकारी सोसाइटी आज मुंह बाए खड़ी है, और किसान ब्लैक में सामान खरीदने को लाचार हैं।
सड़कें या गड्ढों का जाल?
अगर आप मुहम्मदाबाद से शेरपुर जाने की सोच रहे हैं, तो रीढ़ की हड्डी मजबूत करके निकलिए। पूरी सड़क गड्ढों और अवैध अतिक्रमण की चपेट में है। सफर पूरा होते-होते इंसान बेहाल हो जाता है। गांवों के अंदर की गलियां सड़ रही हैं, जल निकासी का कोई नामोनिशान नहीं है, न बच्चों के लिए खेल का मैदान है और न ही किसानों के लिए सुरक्षित खलिहान।
प्रधान जी की ‘चमक’ और अधिकारियों का ‘चश्मा’
कड़वा सच: गांव की गलियां और नाले भले ही सड़ रहे हों, लेकिन कागजी बाजीगरी के दम पर 'प्रधान जी' अधिकारियों की नजर में खूब चमक रहे हैं। नए नवेले पंचायत सचिवालय की चकाचौंध दिखाकर सच को इस तरह दफना दिया गया है कि हुजूर (अधिकारी) को सब ऑल इज वेल नजर आता है।
साहब, एसी कमरे से निकलिए!
‘बेबाक 24’ सीधे तौर पर प्रशासन से सवाल करता है और जिलाधकारी (डीएम) महोदय को चुनौती देता है— हुजूर! कभी बिना बताए, बिना तामझाम के शेरपुर कला, शेरपुर खुर्द और अभागा सेमरा का दौरा करके देखिए।
वहां आज भी विकास का दीपक नहीं जला है। जब आप जमीन पर उतरेंगे, तब आपको समझ आएगा कि जिसे आपके मातहत 'मॉडल विलेज' बता रहे हैं, वहां असलियत में "ऊपर से ठाट-बांट और नीचे रमरेखा घाट" वाली नौबत है। आखिर कब तक शूरवीरों की यह धरती अपनों के ही भ्रष्टाचार और अनदेखी की बलि चढ़ती रहेगी?
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