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पंचायत चुनाव से पहले UP सरकार का बड़ा दांव, बना 'कमिश्नर राज' या पिछड़ों को मिलेगा हक?

by on | 2026-05-21 12:36:46

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पंचायत चुनाव से पहले UP सरकार का बड़ा दांव, बना 'कमिश्नर राज' या पिछड़ों को मिलेगा हक?

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। पंचायत चुनावों की रणभेरी बजने से ठीक पहले योगी सरकार ने एक बड़ा सियासी और प्रशासनिक दांव खेल दिया है। राज्य सरकार ने आनन-फानन में "राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग" का गठन कर दिया है।

​साफ है कि आने वाले पंचायत चुनावों में OBC आरक्षण का ऊंट किस करवट बैठेगा, अब यह पूरी तरह से इस नए नवेले आयोग के फैसलों पर निर्भर करेगा।

​ रिटायर्ड 'सिपहसालारों' के हाथ में कमान!

​सरकार ने इस हाई-प्रोफाइल आयोग की कमान न्यायपालिका के अनुभवी कंधों पर सौंपी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज राम औतार सिंह को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है। लेकिन बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती, आयोग का पूरा ढांचा ही ब्यूरोक्रेसी और न्यायपालिका के दिग्गजों से लैस है।

आयोग की पूरी 'टीम' पर एक नज़र:

  • राम औतार सिंह — अध्यक्ष (रिटायर्ड जज, इलाहाबाद हाईकोर्ट)
  • बृजेश कुमार — सदस्य (रिटायर्ड अपर जिला न्यायाधीश)
  • संतोष कुमार विश्वकर्मा — सदस्य (रिटायर्ड अपर जिला न्यायाधीश)
  • डॉ. अरविंद कुमार चौरसिया — सदस्य (रिटायर्ड IAS अधिकारी)
  • एस.पी. सिंह — सदस्य (रिटायर्ड IAS अधिकारी)

​ सिर्फ 6 महीने की 'डेडलाइन', सवाल कई!

 आयोग को काम निपटाने के लिए सिर्फ छह महीने का वक्त मिला है। अब सवाल यह उठता है कि क्या मात्र आधे साल के भीतर यह आयोग पूरे प्रदेश के ग्रामीण निकायों में OBC आरक्षण के उलझे हुए समीकरणों का सटीक निर्धारण कर पाएगा? या फिर यह सिर्फ चुनावी वैतरणी पार करने का एक अस्थाई पुल है?


​मानदेय और सुविधाओं का 'सरकारी' लिफाफा खुलना बाकी

​सरकार ने आयोग तो बना दिया है, लेकिन इन रिटायर्ड साहबों को मिलने वाले मानदेय (सैलरी) और सरकारी सुख-सुविधाओं का पत्ता अभी नहीं खोला है। इसके लिए सरकार ने अलग से आदेश जारी करने की बात कही है। यानी साहेबों की सुख-सुविधाओं का बंदोबस्त भी जल्द ही 'सरकारी खजाने' से चमचमाता हुआ बाहर आएगा

 बेबाक 24' का विश्लेषण:

​पंचायत चुनाव सिर पर हैं और OBC वोट बैंक यूपी की सियासत की वो चाबी है जिसके बिना सत्ता का ताला नहीं खुलता। इस आयोग के गठन के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आरक्षण का नया फॉर्मूला पिछड़ों को उनका हक दिलाता है या फिर यह सिर्फ तारीखों को आगे बढ़ाने और चुनावी गणित को साधने का एक जरिया बनकर रह जाता है।



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