ब्रेकिंग न्यूज़
सोमनाथ में श्रद्धा और शक्ति का सैलाब: पीएम मोदी ने डमरू बजाकर और त्रिशूल थामकर किया 'शौर्य यात्रा' का शंखनाद
राजनीति राजनीति

माफिया का अंत: जब 'मिट्टी' में मिल गया दशकों का आतंक

by on | 2026-04-16 00:56:38

Share: Facebook | Twitter | WhatsApp | LinkedIn Visits: 3100


माफिया का अंत: जब 'मिट्टी' में मिल गया दशकों का आतंक

संतोष राय

वाराणसी: ​"माफिया को मिट्टी में मिला देंगे!" – सदन के पटल पर गूँजी यह एक हुंकार भारत के सबसे दुस्साहसी अपराधी के अंत की इबारत लिख चुकी थी। 15 अप्रैल जब पूर्वांचल की धरती से उस खौफ का साया सदा के लिए मिट गया, जिसके नाम से कभी सूबे की सियासत कांपती थी।
​हुकूमत के अहंकार से लाचारी की चीख तक
​प्रयागराज की गलियों से निकलकर सत्ता के गलियारों तक पहुँचने वाला अतीक अहमद, जो कभी खुद को कानून से ऊपर समझता था, आखिरी वक्त में कैमरे के सामने गिड़गिड़ा रहा था। वह माफिया जिसका एक इशारा मौत का फरमान होता था, मरते वक्त सिर्फ रहम की भीख मांग रहा था।
​उसने भरे गले से स्वीकार किया था:
"माफियागिरी तो खत्म हो चुकी है... हमारा खानदान मिट्टी में मिल चुका है। अब तो बस रगड़े जा रहे हैं। कम से कम मेरे घर की औरतों और बच्चों को बख्श दो।"
​यह शब्द उस शख्स के थे जिसने हजारों परिवारों को बेघर किया, जमीनों पर कब्जे किए और सरेआम कत्लेआम मचाया। यह एक अपराधी का आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि एक साम्राज्य के ढहने की अंतिम गूँज थी।
​अपराध से साम्राज्य: टांगेवाले का बेटा बना 'जुल्म का पर्याय'
​1962 में एक गरीब परिवार में जन्मा अतीक अहमद, जिसके पिता टांगा चलाते थे, उसने गरीबी को मिटाने के बजाय अपराध को अपना रास्ता चुना।
​1979: पहली हत्या का दाग लगा और फिर मुड़कर नहीं देखा।
​90 का दशक: प्रतिद्वंदियों का सफाया कर अतीक 'अघोषित बादशाह' बन बैठा।
​दहशत का नेटवर्क: अपहरण, रंगदारी और जमीनों पर कब्जे का ऐसा मायाजाल बुना कि प्रयागराज से लेकर बिहार तक उसका सिक्का चलने लगा।
​वह जेल में रहता, तो भी वहां से सरकारें हिलती थीं। चुनाव लड़ता तो जीत पक्की होती। लेकिन वक्त का पहिया घूमा और 'बुलडोजर' की गर्जना ने उसके अवैध महलों को धूल में मिलाना शुरू कर दिया।
​सदन की वो हुंकार और खौफ का खात्मा
​जब उत्तर प्रदेश की विधानसभा में मुख्यमंत्री ने गरजते हुए कहा था कि "इस माफिया को मिट्टी में मिला देंगे", तो वह सिर्फ एक बयान नहीं था। वह प्रदेश की जनता से किया गया एक वादा था। उसके बाद जो हुआ, वह इतिहास है।
​100 से ज्यादा मुकदमे, कुर्क होती करोड़ों की संपत्तियाँ और अपनों का साथ छूटना—अतीक का अहंकार धीरे-धीरे मलबे में तब्दील हो गया। 15 अप्रैल याद दिलाता है कि अपराध का साम्राज्य चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसका अंत हमेशा मिट्टी में ही होता है।



Search
Recent News
Top Trending
Most Popular

Leave a Comment