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विंध्यधाम में गुप्त नवरात्रि : सिद्धियों की चौखट पर उमड़ा आस्था का सैलाब

by on | 2026-01-19 11:12:13

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विंध्यधाम में गुप्त नवरात्रि : सिद्धियों की चौखट पर उमड़ा आस्था का सैलाब

विशेष संवाददाता,

 विंध्यवासिनी धाम (मिर्जापुर) माघ मास की गुप्त नवरात्रि का शुभारंभ हो गया है। कड़ाके की ठंड और सुबह के कोहरे के बावजूद विंध्यवासिनी धाम में भक्तों और साधकों का रेला उमड़ पड़ा है। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर स्थित यह पावन धाम 'जय माता दी' के जयकारों से गुंजायमान है। तंत्र साधकों के लिए यह नौ दिन 'स्वर्ण काल' के समान हैं, जहाँ माँ विंध्यवासिनी के विग्रह और विंध्य पर्वत की गुफाओं में गुप्त अनुष्ठान शुरू हो गए हैं।


पौराणिक महत्व: क्यों खास है यह 'गुप्त' साधना?

पंडित गगन मिश्र के अनुसार, वर्ष में दो प्रत्यक्ष (चैत्र व शारदीय) और दो गुप्त नवरात्रि (माघ व आषाढ़) आती हैं। पौराणिक मान्यता है कि गुप्त नवरात्रि में देवी की पूजा जितनी गोपनीय रखी जाती है, फल उतना ही प्रचंड मिलता है। ऋषि श्रृंगी के अनुसार, कलयुग में बाधाओं की शांति के लिए गुप्त नवरात्रि की साधना अमोघ है। जहाँ आम नवरात्रों में सात्विक पूजा होती है, वहीं गुप्त नवरात्रि में दशमहाविद्या (माँ काली, तारा, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला) की उपासना का विशेष विधान है।

तंत्र साधना का केंद्र: माँ विंध्यवासिनी का जाग्रत स्वरूप

विंध्यवासिनी धाम भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। तंत्र शास्त्र में इसे 'सिद्धिपीठ' की संज्ञा दी गई है। मान्यता है कि भगवान विष्णु की माया (योगमाया) ही यहाँ विंध्यवासिनी के रूप में विराजमान हैं। आज सोमवार का दिन होने के कारण शिव-शक्ति का अद्भुत संयोग बना है। साधक यहाँ मध्यरात्रि में महानिशा पूजा के माध्यम से अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को जागृत कर रहे हैं। मंदिर के प्रधान पुरोहितों के अनुसार, यहाँ की गई साधना कभी निष्फल नहीं होती क्योंकि माँ यहाँ सदेह निवास करती हैं।

त्रिकोण दर्शन: मोक्ष का मार्ग

विंध्य क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ का 'यंत्रवत त्रिकोण' है। भक्त आज से ही इस दुर्गम त्रिकोण यात्रा को पूर्ण करने में जुट गए हैं:

 * माँ विंध्यवासिनी (महालक्ष्मी): त्रिकोण का प्रथम बिंदु, जहाँ जगत की पालनकर्ता का वास है।

 * कालीखोह (महाकाली): पर्वत की तलहटी में स्थित वह गुफा जहाँ माँ ने रक्तबीज का संहार किया था। यह स्थान शत्रुओं के नाश और भय मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है।

 * अष्टभुजा (महासरस्वती): पर्वत के शिखर पर स्थित माँ अष्टभुजा, जो ज्ञान और सात्विकता की अधिष्ठात्री हैं।

लोकोक्ति: क्षेत्र में सदियों से कहा जाता है— "विंध्याचल का जो करे त्रिकोणा, ताके घर न रहे कोई कोना (दुख का)।" अर्थात जो इस त्रिकोण यंत्र की परिक्रमा कर लेता है, उसके जीवन से दरिद्रता और कष्ट समूल नष्ट हो जाते हैं।

प्रशासनिक मुस्तैदी

भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। गंगा घाट से लेकर मंदिर परिसर तक चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। गुप्त नवरात्रि के दौरान दूर-दराज से आने वाले तांत्रिकों और अघोरियों की साधना हेतु कालीखोह और अष्टभुजा की पहाड़ियों पर विशेष व्यवस्था की गई है।




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