by on | 2025-12-31 22:09:49
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- सफेदपोशों के संरक्षण में 'पीला सोना' लूट रहे माफिया, एनजीटी के नियम फांक रहे धूल
- बेखौफ मशीनें, मौन प्रशासन: क्या साहबों की जेबें गरम कर रहा है कनहर का अवैध खनन?
अजय सिंह
सोनभद्र (दुद्धी):उत्तर प्रदेश की 'जीरो टॉलरेंस' नीति को सोनभद्र के खनन माफिया और बेपरवाह अधिकारी मिलकर ठेंगा दिखा रहे हैं। दुद्धी तहसील की खोखा बालू साइट पर इन दिनों जो नजारा है, वह किसी खुली लूट से कम नहीं है। कनहर नदी के 'गर्भ' को प्रतिबंधित मशीनों से इस कदर खंगाला जा रहा है जैसे यहाँ कानून का नहीं, बल्कि केवल 'बाहुबलियों' का राज चलता हो। नदी की जलधारा मोड़कर जलीय पारिस्थितिकी का गला घोंटा जा रहा है और जिम्मेदार अधिकारी कुंभकर्णी नींद में सोए हैं।
दहशत और दबंगई: बगैर सीमांकन 'साम्राज्य' का विस्तार
नियमों की धज्जियां उड़ाने का आलम यह है कि पूरी साइट पर एक भी सीमा स्तंभ (Pillar) नजर नहीं आता। पट्टा धारक (महेश कुमार गर्ग मयंक गर्ग कंपनी) के गुर्गे लीज एरिया की सीमाओं को ठेंगा दिखाकर नदी के प्रतिबंधित क्षेत्रों में मशीनों की गर्जना कर रहे हैं। वन विभाग की एनओसी की शर्तें सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ा रही हैं। सवाल यह है कि जब बगैर सीमांकन खनन करना अवैध है, तो अब तक वन विभाग ने इस पट्टे को निरस्त क्यों नहीं किया?
डिजिटल निगरानी का नाटक, माफिया का डिजिटल 'शॉट'
मुख्यमंत्री के सख्त निर्देश हैं कि हर खनन साइट CCTV और स्कैनर से लैस होनी चाहिए। लेकिन खोखा साइट पर तकनीक के नाम पर 'अंधेर नगरी' है। न 360 डिग्री कैमरे हैं और न ही वाहनों की स्कैनिंग का कोई इंतजाम। सूत्रों की मानें तो यह जानबूझकर किया गया 'सिस्टम फेलियर' है, ताकि ओवरलोडिंग और अवैध परिवहन का काला चिट्ठा रिकॉर्ड ही न हो सके। यहाँ कैमरों की नजर नहीं, बल्कि माफिया की टेढ़ी नजर का खौफ है।
मूकदर्शक बना तंत्र: साहबों को 'सांप' सूंघा या 'साठगांठ' भारी?
जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? जेष्ठ खान अधिकारी का फोन न उठाना और अपर जिलाधिकारी (ADM) का मोबाइल स्विच ऑफ होना महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि मीडिया के तीखे सवालों से बचने की सोची-समझी 'रणनीति' नजर आती है। अधिकारियों की यह 'रहस्यमयी चुप्पी' साफ संकेत दे रही है कि कनहर की कोख उजाड़ने के इस खेल में भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं।
नदी नहीं, 'मौत का कुआं' बना रही लिफ्टिंग मशीनें
नदी के बीचों-बीच उतारी गई भारी लिफ्टिंग मशीनें बालू के साथ जलीय जीवों को भी निकाल रही हैं, ऐसे मे जलीय जीवों के अस्तित्व को भी समाप्त कर रही हैं। एनजीटी के कड़े प्रतिबंधों के बाद भी जलधारा के भीतर मशीनों का चलना यह साबित करता है कि सोनभद्र में प्रशासन का इकबाल खत्म हो चुका है और माफिया का 'समानांतर शासन' चल रहा है।
रिपोर्ट के सवाल:
* सवाल 1: वन विभाग की एनओसी की शर्तों का उल्लंघन होने पर भी डीएफओ मौन क्यों हैं?
* सवाल 2: क्या खनन विभाग को नदी के बीचों-बीच चल रही प्रतिबंधित मशीनें दिखाई नहीं देतीं?
* सवाल 3: आखिर कौन है वो 'सफेदपोश' बाहुबली, जिसके दबाव में पूरा जिला प्रशासन नतमस्तक है?
प्रमुख चिंताएँ और उल्लंघन के बिंदु
पर्यावरणीय क्षति: मशीनों द्वारा जलधारा को मोड़ना और नदी के 'गर्भ' से बालू निकालना जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Aquatic Ecosystem) को पूरी तरह नष्ट कर रहा है। यह NGT (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) के आदेशों का सीधा उल्लंघन है।
प्रशासनिक विफलता: सीमा स्तंभों (Pillars) का अभाव और सीसीटीवी/डिजिटल निगरानी का न होना यह दर्शाता है कि पारदर्शिता को जानबूझकर खत्म किया गया है।
अधिकारियों की चुप्पी: एडीएम और खनन अधिकारियों द्वारा संचार माध्यमों से दूरी बनाना 'साठगांठ' की आशंका को पुख्ता करता है।
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