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भ्रष्टाचार के चक्रव्यूह में राजापुर पंचायत, कहीं 'सिस्टम' ने लूटा हक तो कहीं 'कमीशन' पर छिड़ी जंग

by on | 2025-12-30 21:50:54

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भ्रष्टाचार के चक्रव्यूह में राजापुर पंचायत, कहीं 'सिस्टम' ने लूटा हक तो कहीं 'कमीशन' पर छिड़ी जंग


• मजदूरों का निवाला डकार गए प्रधान के चहेते, एडीओ पंचायत की जांच में गबन की पुष्टि

• पुरस्कृत प्रधान ने खोला मोर्चा; एडीओ पर लगाया 'मोटी कमीशन' और अवैध तबादलों का आरोप

गाजीपुर। जनपद के मोहम्मदाबाद विकास खंड की ग्राम पंचायत राजापुर इस समय भ्रष्टाचार और प्रशासनिक खींचतान का अखाड़ा बन गई है। एक तरफ जहां सरकारी जांच में प्रधान द्वारा चहेतों को लाभ पहुंचाने की बात सामने आई है, वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री अवार्ड से सम्मानित प्रधान ने खुद जाचकर्ता सहायक विकास अधिकारी (एडीओ) पर ही भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप जड़ दिए हैं।

जांच में बड़ा खुलासा: समर्थकों के खातों में भेजी गई मजदूरों की मजदूरी

राजापुर ग्राम पंचायत में मनरेगा और विकास कार्यों के भुगतान में भारी वित्तीय अनियमितता पकड़ी गई है। एडीओ पंचायत की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी आदेशों को ताक पर रखकर मजदूरों और वेंडरों का पैसा ई-ग्राम स्वराज (PFMS) के माध्यम से सीधे ग्राम प्रधान के समर्थकों—परमानन्द सिंह यादव , टुनटुन और खुद के निजी खातों में भेज दिया गया। प्रधान ने इस गड़बड़ी पर व्हाट्सएप के जरिए सफाई देने की कोशिश की, जिसे विभाग ने खारिज करते हुए कार्रवाई की संस्तुति की है।

पुरस्कृत प्रधान की जंग: 'नहीं देंगे कमीशन'

दूसरी ओर, इसी पंचायत के पुरस्कृत प्रधान अश्वनी कुमार राय ने एडीओ पंचायत अशोक कुमार यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। प्रधान का आरोप है कि एडीओ ने आरसी सेंटर के भुगतान के बदले 'मोटी कमीशन' की मांग की और पैसे न देने पर फंड रोक दिया। प्रधान के अनुसार, एडीओ बिना अधिकार के सफाई कर्मचारियों का तबादला कर 'तबादला उद्योग' चला रहे हैं।

एडीओ का काला इतिहास: 17 साल के सस्पेंशन के बाद हुई थी बहाली

शिकायत में यह सनसनीखेज तथ्य भी सामने आया है कि एडीओ अशोक कुमार यादव का भ्रष्टाचार का रिकॉर्ड पुराना है। वर्ष 1997 से 2014 तक वह करीब 17 वर्षों तक सस्पेंशन की मार झेल चुके हैं। हाल ही में 32 लाख रुपये के गबन का एक पुराना केस भी उनके खिलाफ चर्चा में आया है। जिलाधिकारी अविनाश कुमार को सौंपी गई शिकायत के बाद अब विभाग में हड़कंप मचा है।

बेबाक विशेष: राजापुर पंचायत का यह प्रकरण जिले की प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक तरफ गरीबों के पसीने की कमाई चहेतों की जेब में जा रही है, तो दूसरी तरफ एक 'मॉडल' गांव के विकास को कथित तौर पर कमीशन की भेंट चढ़ाया जा रहा है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इन दोनों गंभीर मामलों में क्या रुख अपनाता है।




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