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सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: 'जजों से भी हो सकती है गलती', न्याय की कसौटी पर रसूख और सिसकती संवेदनाएं

by on | 2025-12-30 00:01:01

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सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: 'जजों से भी हो सकती है गलती', न्याय की कसौटी पर रसूख और सिसकती संवेदनाएं

सन्तोष राय

वाराणसी : ​न्याय का वह शाश्वत सिद्धांत, जिसमें माना जाता है कि मृत्यु के द्वार पर खड़ा व्यक्ति असत्य नहीं बोलता, आज उत्तर प्रदेश की सियासी और कानूनी गलियारों में मचे घमासान के बीच नई बहस का केंद्र है। एक तरफ उन्नाव कांड की पीड़िता के आंसू हैं, तो दूसरी तरफ मऊ के पूर्व सांसद अतुल राय के 'ऑडियो क्लिप्स' का दावा। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने उन्नाव रेप केस के दोषी कुलदीप सिंह सेंगर की जमानत पर रोक लगाकर यह स्पष्ट कर दिया कि 'लोक सेवक' की परिभाषा और सत्ता का रसूख कानून से ऊपर नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: 'परिस्थितियां असाधारण हैं'

​चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसने 23 दिसंबर को सेंगर को जमानत दी थी। सीजेआई ने बेहद संतुलित लेकिन सख्त लहजे में कहा, "हाईकोर्ट के जज बेहतरीन हैं, लेकिन गलती किसी से भी हो सकती है।" कोर्ट ने इस विसंगति पर चिंता जताई कि क्या पोक्सो (POCSO) एक्ट के तहत एक पुलिसकर्मी तो लोक सेवक है, लेकिन एक निर्वाचित विधायक नहीं? 'आडवाणी बनाम सीबीआई (1997)' केस का हवाला देते हुए अदालत ने जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही को नए सिरे से परिभाषित करने का संकेत दिया है।

उन्नाव की सिसकी: 'उसे फांसी दिलाकर ही दम लूंगी'

​सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद कोर्ट रूम के बाहर भावुक दृश्य दिखा। न्याय की आस टूटने की बात कहने वाली पीड़िता फूट-फूटकर रो पड़ी। उसने अपना संकल्प दोहराया कि वह अपने परिवार के विनाश के जिम्मेदार सेंगर को फांसी दिलाकर ही चैन लेगी। यह वही पीड़िता है जिसने 2017 से अब तक पिता को खोया, संदिग्ध एक्सीडेंट में परिजनों की अर्थियां उठाईं और व्यवस्था के हर मोर्चे पर अकेले संघर्ष किया।

मऊ: ऑडियो का मायाजाल और सिस्टम पर 'अंतिम प्रहार'

​इसी पृष्ठभूमि में मऊ के पूर्व सांसद अतुल राय का मामला न्याय प्रणाली की शुचिता को चुनौती दे रहा है। जहाँ सुप्रीम कोर्ट वाराणसी की पीड़िता (प्रिया राय) के 'डाइंग डिक्लेरेशन' की पवित्रता पर जोर दे रहा है, वहीं अतुल राय 100 ऑडियो रिकॉर्डिंग के सहारे खुद को निर्दोष बता रहे हैं।

आतंक का वह 'लाइव' वीडियो:

उल्लेखनीय है कि दम तोड़ने से पहले पीड़िता ने अपने गवाह के साथ फेसबुक लाइव में भ्रष्टाचार और रसूख के गठजोड़ का खुलासा किया था। उसने तत्कालीन आईपीएस अमिताभ ठाकुर, सीओ अमरेश सिंह बघेल, और नरही (बलिया) के तत्कालीन थानाध्यक्ष टीबी सिंह सहित कई न्यायिक और पुलिस अधिकारियों के नामों का उल्लेख किया था। पीड़िता ने कराहते हुए कहा था कि "पैसा और पावर के सामने हम टूट गए हैं।" उसने आशंका जताई थी कि रसूखदार लोग उसके वीडियो को गायब करा सकते हैं, इसलिए लोगों से इसे सुरक्षित रखने की अपील की थी।

साजिश का ताना-बाना और दोहरे मापदंड

​सूत्रों का दावा है कि पीड़िता के गवाह पर भी बलात्कार का मुकदमा नरही थाने में तत्कालीन थानाध्यक्ष टीबी सिंह द्वारा अतुल राय के करीबी पुनीत राय 'सोनू' के प्रभाव में दर्ज कराया गया था। अपराधी प्रवृत्ति का सोनू लगातार गवाहों का पीछा कर रहा था। अब सवाल यह उठता है कि क्या ये ऑडियो रिकॉर्डिंग इसी माफिया तंत्र के सर्विलांस का हिस्सा हैं या एआई (AI) के युग में गढ़े गए हथियार?

​जानकारों का तर्क है कि यदि अतुल राय ऑडियो को ढाल बना रहे हैं, तो कृष्णानंद राय हत्याकांड के उस कालखंड को क्यों भुला दिया जाए, जब मुख्तार अंसारी और अभय सिंह की ऑडियो क्लिप्स को कोर्ट में वह मान्यता नहीं मिली थी? क्या डिजिटल साक्ष्यों की स्वीकार्यता अब आरोपियों के रसूख और उनके 'मैनेजमेंट' के आधार पर तय होगी?

निष्कर्ष: सिस्टम की साख दांव पर

​एक ओर उन्नाव में सीबीआई की दलील है कि रसूखदार अपराधी की रिहाई न्याय के उद्देश्य को ही समाप्त कर देगी, तो दूसरी ओर मऊ में रसूख के दम पर गवाहों को डराने और डिजिटल साक्ष्यों के जरिए 'क्लीन चिट' का खेल खेला जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट का ताजा रुख यह स्पष्ट संकेत देता है कि तकनीक और रसूख के शोर में 'पीड़िता के अंतिम शब्दों' और 'कानूनी शुचिता' को दरकिनार नहीं किया जा सकता। न्याय अभी अधूरा है, और बाहुबलियों की जमानत पर सेखी बघारने की आदत पर कानून का शिकंजा कसना अभी बाकी है।



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