by on | 2025-12-25 14:26:15
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सन्तोष राय
राज्य / वाराणसी । सुप्रीम कोर्ट की वह टिप्पणी आज फिर चर्चा के केंद्र में है जिसमें जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की पीठ ने कहा था कि मृत्यु के निकट खड़ा व्यक्ति झूठ के इरादे से दूर होता है। लेकिन उत्तर प्रदेश की जमीनी राजनीति और कानूनी लड़ाइयों के पन्ने कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। वर्तमान में बलात्कार जैसे गंभीर आरोपों में घिरे नेताओं और पीड़ितों के बयानों ने ठंड के मौसम में भी सूबे का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है।
भरोसा और जमानत: उन्नाव से उठी टीस
बीते दिनों उन्नाव रेप कांड के मुख्य आरोपी और पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को हाई कोर्ट से जमानत मिलने के बाद पीड़िता का दर्द छलक उठा। पीड़िता का यह बयान कि "न्याय से भरोसा उठ गया है", व्यवस्था की चूलें हिलाने के लिए पर्याप्त है। यह उस 'मृत्यु पूर्व कथन' की अवधारणा पर भी सवाल खड़ा करता है, जहाँ एक जीवित पीड़िता न्याय की गुहार लगाते-लगाते व्यवस्था से हार मान रही है।
मऊ: ऑडियो क्लिप्स की गवाही या छद्म का जाल?
दूसरी ओर, घोषी के पूर्व सांसद अतुल राय पर लगे दुराचार के आरोपों ने एक नया मोड़ ले लिया है। पूर्व सांसद सार्वजनिक रूप से ऑडियो रिकॉर्डिंग सुनाकर खुद को निर्दोष बता रहे हैं। उनका दावा है कि उनके पास ऐसी 100 रिकॉर्डिंग हैं जो उन्हें फंसाने की साजिश का पर्दाफाश करती हैं।
यहाँ कई यक्ष प्रश्न खड़े होते हैं:
स्रोत का रहस्य: क्या यह रिकॉर्डिंग शूटर अंगद राय ने दी, या उस पीड़िता के संघर्ष का हिस्सा थी जिसने सिस्टम पर 'आतंक और छल' का आरोप लगाते हुए मौत को गले लगा लिया?
सर्विलांस का खेल: क्या कार्पोरेट माफिया के करीबी पुलिस अधिकारियों ने 'सर्विलांस' के अधिकारों का दुरुपयोग कर इस माफिया तंत्र के लिए राह आसान की?
एआई और कृत्रिमता: आशंका इस बात की भी है कि क्या इन ऑडियो क्लिप्स को 'कृत्रिम' (Artificial) हथियार बनाकर अदालती गवाह के रूप में पेश किया जा रहा है?
कानून के दोहरे पैमाने?
अतुल राय जिस ऑडियो के आधार पर बरी होने का स्वप्न देख रहे हैं, उसका दूसरा पहलू बेहद चौंकाने वाला है। जानकारों का तर्क है कि यदि ऑडियो ही बरी होने का आधार है, तो भाजपा विधायक कृष्णानंद राय हत्याकांड में माफिया मुख्तार अंसारी और अभय सिंह की ऑडियो रिकॉर्डिंग को अदालत ने वह मान्यता क्यों नहीं दी? क्या साक्ष्यों की स्वीकार्यता व्यक्ति के रसूख और समय के हिसाब से बदल जाती है?
निष्कर्ष: दांव पर सिस्टम की साख
एक तरफ वह पीड़िता थी जिसने न्याय न मिलने की हताशा में मौत को चुना, और दूसरी तरफ वह आरोपी नेता हैं जो डिजिटल साक्ष्यों के दम पर 'क्लीन चिट' का दावा कर रहे हैं। यदि डिजिटल साक्ष्य ही अंतिम सत्य मान लिए गए, तो 'मृत्यु पूर्व कथन' और प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही के मायने बदल जाएंगे। फिलहाल, गेंद न्यायपालिका के पाले में है कि वह तकनीक के शोर में सिसकते न्याय की आवाज को कैसे पहचानती है।
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