ब्रेकिंग न्यूज़
सोमनाथ में श्रद्धा और शक्ति का सैलाब: पीएम मोदी ने डमरू बजाकर और त्रिशूल थामकर किया 'शौर्य यात्रा' का शंखनाद
ताजा खबर ताजा खबर

अरावली की नई परिभाषा से राजस्थान के अस्तित्व पर संकट: 90% पहाड़ियाँ संरक्षण से हो सकती हैं बाहर

by admin@bebak24.com on | 2025-12-22 20:40:23

Share: Facebook | Twitter | WhatsApp | LinkedIn Visits: 3058


अरावली की नई परिभाषा से राजस्थान के अस्तित्व पर संकट: 90% पहाड़ियाँ संरक्षण से हो सकती हैं बाहर

 जयपुर ​अरावली पर्वतमाला, जिसे राजस्थान की 'जीवनरेखा' कहा जाता है, आज एक कानूनी परिभाषा के फेर में फंसकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन अरावली मामले में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित 'वैज्ञानिक परिभाषा' ने पर्यावरणविदों और आम जनता की चिंताएं बढ़ा दी हैं। यदि यह नई परिभाषा लागू होती है, तो राजस्थान की लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियाँ कागजों पर 'अरावली' कहलाने का हक खो देंगी।

क्या है नया गणित?

​केंद्र सरकार के प्रस्ताव के अनुसार, अब केवल उसी भू-भाग को 'अरावली हिल' माना जाएगा जिसकी ऊंचाई आसपास के धरातल से कम से कम 100 मीटर अधिक होगी। साथ ही, यदि ऐसी दो पहाड़ियाँ 500 मीटर के दायरे में होंगी, तभी उन्हें 'अरावली रेंज' का हिस्सा माना जाएगा। सरकार का तर्क है कि इससे पूरे देश में एक समान स्पष्टता आएगी, लेकिन राजस्थान के संदर्भ में यह परिभाषा घातक सिद्ध होती दिख रही है।

राजस्थान को होने वाले संभावित नुकसान

​तकनीकी अध्ययनों के अनुसार, राजस्थान में अरावली का विस्तार सबसे अधिक है, लेकिन यहाँ की अधिकांश पहाड़ियाँ मध्यम या कम ऊंचाई की हैं। नई शर्त लागू होने पर:

  • संरक्षण का कवच हटेगा: राज्य की केवल 8 से 10 प्रतिशत पहाड़ियाँ ही कानूनी रूप से संरक्षित रह पाएंगी। शेष 90% क्षेत्र खनन और अनियंत्रित निर्माण के लिए खुल सकते हैं।
  • रेगिस्तान का विस्तार: ये पहाड़ियाँ थार रेगिस्तान की धूल भरी आँधियों को रोकने का काम करती हैं। इनके खत्म होने से रेगिस्तान का फैलाव पूर्वी राजस्थान की ओर तेजी से बढ़ेगा।
  • जल संकट: अरावली भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) का मुख्य स्रोत है। इसके नष्ट होने से जयपुर, अलवर, सीकर और उदयपुर जैसे जिलों में जल स्तर पाताल में चला जाएगा।

विकास या विनाश: समाज के सामने बड़ा सवाल

​विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली केवल पत्थर का ढेर नहीं, बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र है। एक बार पहाड़ कटने और जलधाराएँ टूटने के बाद उन्हें पुनर्जीवित करना असंभव होगा। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यह लड़ाई केवल अदालती कमरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

"अरावली को बचाना अब केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि राजस्थान के भविष्य, खेती और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य का सवाल है। आज की चुप्पी भविष्य के सूखे और प्रदूषण का निमंत्रण है।"


​अब गेंद जनता और सरकार के पाले में है। क्या मुनाफे के लिए प्राकृतिक धरोहर की बलि दी जाएगी, या 'राजस्थान की सुरक्षा दीवार' को बचाने के लिए कड़े कदम उठाए जाएंगे?



Search
Recent News
Top Trending
Most Popular

Leave a Comment