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बिहार में सत्ता बदलाव की चर्चा क्यों? राजद के ऑफर से लेकर जदयू के गणित तक समझें

by admin@bebak24.com on | 2026-09-19 18:00:26

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बिहार में सत्ता बदलाव की चर्चा क्यों? राजद के ऑफर से लेकर जदयू के गणित तक समझें

पटना | बेबाक24 न्यूज़

बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार को लेकर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज है। राजद की ओर से जदयू को साथ आने का खुला प्रस्ताव, समान नागरिक संहिता को लेकर मतभेद और नीतीश कुमार की भूमिका ने सत्ता के संभावित समीकरणों पर चर्चा बढ़ा दी है। हालांकि मौजूदा विधानसभा संख्या के आधार पर राजद के लिए अकेले सरकार बनाने का रास्ता आसान नहीं है।

2013 से 2024 तक बदलते रहे सत्ता समीकरण

बिहार की राजनीति में जदयू की भूमिका लंबे समय से सत्ता के समीकरणों के केंद्र में रही है। 2013 में नरेंद्र मोदी को लेकर मतभेद के बाद नीतीश कुमार ने भाजपा से दूरी बनाई थी। उस समय सरकार बचाने के लिए उन्हें कांग्रेस और अन्य विधायकों के समर्थन की जरूरत पड़ी थी।

2015 में जदयू और राजद के बीच गठबंधन हुआ और महागठबंधन की सरकार बनी। हालांकि 2017 में भ्रष्टाचार के आरोपों और राजनीतिक मतभेदों के बीच नीतीश कुमार ने महागठबंधन से अलग होकर फिर भाजपा के साथ सरकार बना ली।

इसके बाद 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू की सीटें घटकर 43 रह गईं। 2022 में नीतीश कुमार ने फिर भाजपा का साथ छोड़ा और राजद के साथ सरकार बनाई। लेकिन जनवरी 2024 में उन्होंने महागठबंधन से अलग होकर दोबारा भाजपा के साथ सरकार बना ली।

2026 में विवाद की नई वजह क्या है?

अप्रैल 2026 में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने। इसके बाद से राजद लगातार जदयू और भाजपा के रिश्तों को लेकर सवाल उठाता रहा है।

अब समान नागरिक संहिता का मुद्दा इस राजनीतिक खींचतान का नया केंद्र बन गया है। राजद का कहना है कि भाजपा जदयू की असहमति के बावजूद बिहार में यूसीसी लागू करना चाहती है। इसी आधार पर राजद ने जदयू के सामने राजनीतिक विकल्प का प्रस्ताव रखा है।

जदयू की ओर से अभी इस प्रस्ताव पर कोई ऐसा संकेत नहीं दिया गया है जिससे गठबंधन बदलने की स्थिति स्पष्ट हो। पार्टी की ओर से कहा गया है कि राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा इस विषय पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बिहार के सामाजिक और राजनीतिक समीकरण के संदर्भ में बातचीत करेंगे।

क्या राजद के पास सरकार बनाने का आंकड़ा है?

यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 122 विधायकों का समर्थन चाहिए।

स्रोत के अनुसार 2025 के विधानसभा चुनाव में राजद को 25 सीटें मिलीं, जबकि जदयू के पास 85 विधायक हैं। कांग्रेस के छह, वाम दलों के तीन और इंडियन इनक्लूसिव पार्टी के एक विधायक को जोड़ने पर महागठबंधन के पास 35 विधायक होते हैं।

यदि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के पांच और बहुजन समाज पार्टी के एक विधायक को भी जोड़ लिया जाए तो संख्या 41 तक पहुंचती है। जन सुराज के एक विधायक को जोड़ने पर यह आंकड़ा 42 होता है।

इस स्थिति में 122 के बहुमत तक पहुंचने के लिए जदयू के 85 विधायकों का समर्थन निर्णायक हो जाता है। यानी मौजूदा संख्या के हिसाब से राजद के सामने सरकार बनाने का रास्ता जदयू के समर्थन से ही बन सकता है।

दूसरे सहयोगियों से भी पूरी नहीं होती संख्या

जदयू के बिना राजद यदि चिराग पासवान की पार्टी, जीतन राम मांझी की पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा के विधायकों को जोड़ने की संभावना देखे, तब भी संख्या बहुमत से काफी दूर रहती है।

स्रोत में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक इन दलों के 19, 5 और 4 विधायक मिलाकर 28 होते हैं। 42 विधायकों के साथ इन्हें जोड़ने पर कुल संख्या 70 तक पहुंचती है। इसलिए मौजूदा आंकड़ों में जदयू के बिना सरकार बनाने का समीकरण पूरा नहीं होता।

फिर राजनीतिक चर्चा क्यों तेज है?

राजद के प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक विश्लेषण में अलग-अलग संभावनाएं सामने आ रही हैं। चाणक्य इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के अध्यक्ष सुनील कुमार सिन्हा के अनुसार, राजद का उद्देश्य तत्काल सरकार बनाना नहीं, बल्कि जदयू और नीतीश कुमार के बीच राजनीतिक असहजता पैदा करना भी हो सकता है।

हालांकि यह विश्लेषण है, कोई स्थापित राजनीतिक परिणाम नहीं। जदयू की ओर से गठबंधन बदलने का फैसला सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।

बिहार की मौजूदा विधानसभा संख्या यह बताती है कि सत्ता परिवर्तन की किसी भी स्थिति में जदयू की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। इसलिए फिलहाल राजद का प्रस्ताव राजनीतिक चर्चा का विषय जरूर है, लेकिन इसे सरकार बदलने की निश्चित प्रक्रिया के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।

बेबाक24 की राय

बिहार की राजनीति में पिछले वर्षों के घटनाक्रम बताते हैं कि गठबंधन बदलने से सत्ता का समीकरण तेजी से बदल सकता है। लेकिन मौजूदा विधानसभा संख्या के आधार पर किसी भी संभावित बदलाव के लिए जदयू की भूमिका केंद्रीय बनी हुई है। राजद का प्रस्ताव और यूसीसी पर राजनीतिक मतभेद चर्चा को बढ़ा सकते हैं, लेकिन सरकार के भविष्य पर अंतिम तस्वीर संबंधित दलों के आधिकारिक फैसलों और विधानसभा में उनके वास्तविक समर्थन से ही स्पष्ट होगी।



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