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हिमालय में मंडरा रहा बड़ा खतरा: सतलुज बेसिन में मिलीं 2292 ग्लेशियल झीलें

by on | 2026-08-28 11:57:31

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हिमालय में मंडरा रहा बड़ा खतरा: सतलुज बेसिन में मिलीं 2292 ग्लेशियल झीलें

शिमला | बेबाक24 न्यूज़

नेपाल में हालिया बाढ़ की भयावहता ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद के एक अध्ययन में सतलुज बेसिन में 2292 ग्लेशियल झीलों की पहचान हुई है। इनमें 1335 झीलें तिब्बत क्षेत्र में हैं, जहां भारत की सीधी निगरानी सीमित है। विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से अस्थिर झीलों के टूटने पर हिमाचल के साथ पंजाब और जम्मू-कश्मीर तक अचानक बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है।

तिब्बत में हैं सबसे अधिक झीलें

अध्ययन के मुताबिक सतलुज बेसिन में चिन्हित 2292 झीलों में 470 हिमाचल के स्पीति क्षेत्र और 487 किन्नौर के खाब क्षेत्र से नीचे स्थित हैं। इनमें 49 झीलें 10 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में फैली हुई हैं, जबकि 51 झीलों का विस्तार 5 से 10 हेक्टेयर के बीच है।

विशेषज्ञों के मुताबिक सभी ग्लेशियल झीलें खतरनाक नहीं होतीं, लेकिन जिनका आकार तेजी से बढ़ रहा है या जिनके प्राकृतिक बांध कमजोर हैं, उनकी लगातार निगरानी जरूरी है।

गीपनगाथ झील का चार गुना बढ़ा आकार

चिनाब बेसिन में लाहौल-स्पीति के सिस्सू के पास स्थित गीपनगाथ झील को भी चिंता का कारण माना जा रहा है। अध्ययन के अनुसार 1975 में इसका क्षेत्रफल करीब 27 हेक्टेयर था, जो बढ़कर लगभग 110 हेक्टेयर हो गया है। इसकी औसत गहराई करीब 36 मीटर बताई गई है।

विशेषज्ञों के अनुसार भूस्खलन, हिमस्खलन, भूकंप या प्राकृतिक बांध कमजोर होने से यदि यह झील टूटती है तो पानी और मलबे का तेज बहाव निचले क्षेत्रों को प्रभावित करते हुए जम्मू-कश्मीर तक पहुंच सकता है।

तिब्बत की झीलों पर निगरानी सबसे बड़ी चुनौती

हिमकोस्टे के वैज्ञानिकों के अनुसार उपग्रह चित्रों के विश्लेषण से सतलुज बेसिन में बड़ी संख्या में ग्लेशियल झीलों का पता चला है। वर्ष 2019 के आंकड़ों में चिनाब बेसिन में 242, ब्यास में 93 और रावी में 38 झीलों की पहचान की गई थी।

चिंता इसलिए भी बढ़ती है क्योंकि सतलुज बेसिन का बड़ा हिस्सा तिब्बत में आता है। ऐसे में वहां मौजूद झीलों में होने वाले बदलाव की समय रहते जानकारी हासिल करना आसान नहीं है।

सांगला की यारपाबंग झील भी चिंता का कारण

किन्नौर की सांगला घाटी स्थित देबार कंडे में यारपाबंग झील का बढ़ता आकार स्थानीय लोगों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। बताया गया है कि यह झील करीब 550 मीटर लंबी और 260 मीटर चौड़ी है।

भूकंप या अचानक बाढ़ जैसी स्थिति में इसके टूटने से बास्पा और सतलुज नदी के आसपास बसे क्षेत्रों पर खतरा बढ़ सकता है। स्थानीय लोगों ने प्रशासन से झील की सुरक्षा और नियमित निगरानी की मांग की है।

हिमाचल की 4 झीलों पर विशेष नजर

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने हिमाचल की कुछ ग्लेशियल झीलों को अत्यधिक संवेदनशील माना है। इनमें कुल्लू की वासुकी झील, लाहौल-स्पीति की गीपनगाथ झील, सांगला घाटी की बास्पा झील और सतलुज बेसिन की काशंग गाड़ स्थित कलका झील शामिल हैं।

इन झीलों में संभावित बदलाव पर नजर रखने के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित करने का काम किया जा रहा है।

पहले भी हो चुकी है भारी तबाही

हिमाचल में ग्लेशियल झीलों के टूटने से पहले भी गंभीर नुकसान हो चुका है। वर्ष 2000 में सतलुज में आई बाढ़ के दौरान नदी का जलस्तर सामान्य से करीब 60 फीट ऊपर पहुंच गया था। लगभग 200 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग प्रभावित हुआ और कई पुल बह गए थे। इस आपदा में 135 लोगों की मौत हुई थी।

इसके बाद वर्ष 2005 में तिब्बत की पारछू झील टूटने से सतलुज में बाढ़ आई थी। उस दौरान भी सड़क और पुलों को भारी नुकसान पहुंचा था।

विशेषज्ञों ने चेताया, नदियों के किनारे निर्माण रोकना जरूरी

एनआईटी हमीरपुर के सिविल इंजीनियरिंग विशेषज्ञ राजेश्वर सिंह बांश्टू के अनुसार हिमाचल की प्रमुख नदियों के बेसिन में कई ऐसी ग्लेशियल झीलें विकसित हो चुकी हैं, जो भविष्य में गंभीर आपदा का कारण बन सकती हैं।

उनका कहना है कि सरकारों को नदियों के किनारे अनियंत्रित निर्माण पर रोक लगाने के साथ झीलों की नियमित निगरानी, संभावित बाढ़ मार्गों की पहचान और समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।

नेपाल की हालिया त्रासदी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्रों में आपदा का खतरा केवल किसी एक देश या राज्य तक सीमित नहीं है। हिमालय के ऊपरी हिस्से में होने वाली एक घटना का असर निचले क्षेत्रों में दूर तक महसूस किया जा सकता है। ऐसे में समय रहते निगरानी और तैयारी ही बड़े नुकसान को रोकने का सबसे प्रभावी उपाय हो सकती है।



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