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National Space National Space Day: भारत की अंतरिक्ष उड़ान तेज, फिर फिल्मों में स्पेस कहानियां क्यों कम? फिल्मकारों ने बताई वजहay: भारत की अंतरिक्ष उड़ान तेज, फिर फिल्मों में स्पेस कहानियां क्यों कम? फिल्मकारों ने बताई वजह

by admin@bebak24.com on | 2026-08-23 10:21:03

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National Space National Space Day: भारत की अंतरिक्ष उड़ान तेज, फिर फिल्मों में स्पेस कहानियां क्यों कम? फिल्मकारों ने बताई वजहay: भारत की अंतरिक्ष उड़ान तेज, फिर फिल्मों में स्पेस कहानियां क्यों कम? फिल्मकारों ने बताई वजह

नई दिल्ली | बेबाक24 न्यूज़

भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। चंद्रयान ने चांद तक पहुंच बनाई, मंगलयान ने मंगल की कक्षा में भारत की क्षमता दिखाई और अब गगनयान की तैयारियां आगे बढ़ रही हैं। इसके बावजूद भारतीय फिल्मों में अंतरिक्ष आधारित कहानियों की संख्या अपेक्षाकृत कम है।

राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के मौके पर अंतरिक्ष आधारित फिल्में और धारावाहिक बना चुके फिल्मकारों ने इसके पीछे की वजहों पर अपनी राय रखी। उनके मुताबिक समस्या केवल बड़े बजट या दृश्य प्रभावों की नहीं है, बल्कि जोखिम लेने, मजबूत लेखन, वैज्ञानिकों के साथ काम करने और दर्शकों पर भरोसा करने की कमी भी बड़ी वजह है।

जगन शक्ति: विज्ञान को कहानी में बदलना सबसे बड़ी चुनौती

‘मिशन मंगल’ के निर्देशक जगन शक्ति ने फिल्म बनाने से पहले करीब 6 महीने तक शोध किया था। वैज्ञानिकों से बातचीत के दौरान उन्हें महसूस हुआ कि असली चुनौती वैज्ञानिक तथ्यों को समझने से ज्यादा उन्हें आम दर्शक के लिए रोचक कहानी में बदलना है।

उनके मुताबिक वैज्ञानिक बातचीत में कई तकनीकी अवधारणाएं बताते थे। लेकिन अगर वही तकनीकी जानकारी सीधे फिल्म में डाल दी जाए तो कहानी मनोरंजन के बजाय विज्ञान की किताब जैसी लग सकती है।

जगन शक्ति का मानना है कि विज्ञान को सरल और रोचक तरीके से प्रस्तुत करना आसान काम नहीं है और शायद इसी वजह से कई लेखक विज्ञान आधारित कहानियों से दूरी बनाए रखते हैं।

खुद इंजीनियर रहे जगन शक्ति का कहना है कि वैज्ञानिकों और फिल्मकारों के बीच बेहतर सहयोग हो तो अंतरिक्ष और विज्ञान से जुड़ी कहीं अधिक प्रभावशाली कहानियां बनाई जा सकती हैं।

आरती कड़व: बॉलीवुड बड़े बजट और भारी दृश्य प्रभावों से जोड़ता है स्पेस सिनेमा

‘कार्गो’ की निर्देशक आरती कड़व ने अंतरिक्ष को एक अलग और दार्शनिक नजरिए से पर्दे पर प्रस्तुत किया था। उनके मुताबिक यह एक स्वतंत्र फिल्म थी और उसे बनाना ही बड़ी चुनौती थी।

उन्होंने बताया कि ‘कार्गो’ के बाद उन्होंने करीब 3 वर्ष तक एक और अंतरिक्ष फिल्म बनाने की कोशिश की, लेकिन परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।

आरती कड़व के अनुसार इसकी 2 बड़ी वजह थीं। पहली, बॉलीवुड अंतरिक्ष फिल्मों को बड़े बजट और भारी दृश्य प्रभावों से जोड़कर देखता है। दूसरी, फिल्म उद्योग में जोखिम लेने की इच्छा कम है।

उनका कहना है कि अच्छी अंतरिक्ष फिल्म बनाने के लिए हिम्मत के साथ जोखिम लेना जरूरी है। लगातार यह सोचते रहना कि फिल्म सफल होगी या नहीं, रचनात्मक प्रयास को रोक सकता है।

संजय पूरन सिंह चौहान: दर्शकों को कम आंकना बंद करना होगा

फिल्म निर्देशक संजय पूरन सिंह चौहान ने ‘चंदा मामा दूर के’ के जरिए भारत की एक बड़ी अंतरिक्ष फिल्म बनाने की कोशिश की थी। इसमें सुशांत सिंह राजपूत को अंतरिक्ष यात्री की भूमिका में दिखाया जाना था और उन्होंने इसके लिए अमेरिका में प्रशिक्षण भी लिया था।

फिल्म पूरी नहीं हो सकी, लेकिन संजय पूरन का मानना है कि भारतीय फिल्म उद्योग की एक बड़ी समस्या यह धारणा है कि दर्शक जटिल विज्ञान को समझ नहीं पाएगा।

उनके अनुसार आज भारतीय दर्शकों की दुनिया भर के सिनेमा तक पहले से कहीं अधिक पहुंच है। दर्शक कठिन विषयों वाली अंतरराष्ट्रीय फिल्में देखता और समझने की कोशिश करता है।

उन्होंने कहा कि भारतीय फिल्मकारों को यह मानना बंद करना चाहिए कि दर्शक विज्ञान की जटिल अवधारणाओं को स्वीकार नहीं करेगा।

विज्ञान को जरूरत से ज्यादा आसान बनाना भी समस्या

संजय पूरन का मानना है कि भारतीय फिल्मों में कई बार विज्ञान को इतना सरल कर दिया जाता है कि उसकी वास्तविक गंभीरता ही खत्म हो जाती है।

उनके अनुसार इसरो और रक्षा अनुसंधान से जुड़े वैज्ञानिक भी कई बार इस बात पर सवाल उठाते हैं कि फिल्मों में वैज्ञानिक विषयों को जरूरत से ज्यादा आसान बनाकर प्रस्तुत किया जाता है।

वहीं, हॉलीवुड में वैज्ञानिक संस्थानों और फिल्मकारों के बीच सहयोग के उदाहरण मौजूद हैं। इसका फायदा उठाकर वहां विज्ञान और अंतरिक्ष पर आधारित कहानियां बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचती हैं।

निखिल आडवाणी: अंतरिक्ष की उपलब्धियों के पीछे इंसानी कहानियां हैं

‘रॉकेट बॉयज’ के रचनाकार निखिल आडवाणी के मुताबिक भारत के पास अंतरिक्ष क्षेत्र में कहने के लिए अभी बहुत कुछ है।

उनका कहना है कि मंगलयान, चंद्रयान और इसके बाद की उपलब्धियां अपने आप में बड़ी कहानियां हैं। लेकिन अब दर्शकों को इन मिशनों के पीछे काम करने वाले लोगों की संघर्ष, असफलता, व्यक्तिगत चुनौतियों और मानवीय भावनाओं की कहानियां भी दिखाई जानी चाहिए।

उनके अनुसार वह खुद भी भविष्य में ऐसी और कहानियां बनाना चाहेंगे।

क्या केवल पैसा ही सबसे बड़ी समस्या है?

फिल्मकारों की बातों से यह संकेत मिलता है कि अंतरिक्ष सिनेमा की कमी के लिए केवल बजट को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

भारत में ‘मिशन मंगल’, ‘रॉकेट्री’, ‘रॉकेट बॉयज’ और ‘कार्गो’ जैसी प्रस्तुतियों ने अलग-अलग तरीकों से अंतरिक्ष और विज्ञान को पर्दे पर दिखाया है।

इन उदाहरणों से पता चलता है कि हर अंतरिक्ष कहानी के लिए विशाल बजट जरूरी नहीं। सटीक शोध, वैज्ञानिक सहयोग, मजबूत पटकथा और दर्शकों पर भरोसा भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

बेबाक24 का नजरिया

भारत की अंतरिक्ष यात्रा जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, भारतीय सिनेमा की अंतरिक्ष कहानियां उतनी तेजी से नहीं बढ़ी हैं। लेकिन असली कमी विषयों की नहीं, दृष्टिकोण और जोखिम लेने की है।

चंद्रयान, मंगलयान, गगनयान और भारतीय वैज्ञानिकों की व्यक्तिगत यात्राओं में ऐसे कई मानवीय और नाटकीय पहलू हैं जिन्हें बड़े पर्दे पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है।



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