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भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल: ‘करो या मरो’ ने कैसे बदली आजादी की लड़ाई की दिशा?

by on | 2026-08-08 12:48:21

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भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल: ‘करो या मरो’ ने कैसे बदली आजादी की लड़ाई की दिशा?

नई दिल्ली: 8 अगस्त 1942 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक निर्णायक दिन माना जाता है। इसी दिन मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान, जिसे आज अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाता है, से महात्मा गांधी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ निर्णायक जनसंघर्ष का आह्वान किया था।

गांधीजी का संदेश था—‘करो या मरो’। इसके साथ ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन से भारत छोड़ने की मांग करते हुए भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया। 9 अगस्त को शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन देशभर में फैल गया और जल्द ही यह एक व्यापक जनआंदोलन में बदल गया।

आखिर 1942 में आंदोलन की जरूरत क्यों पड़ी?

भारत छोड़ो आंदोलन अचानक पैदा हुई राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं थी। इसकी पृष्ठभूमि में द्वितीय विश्व युद्ध, ब्रिटिश सरकार की नीतियां और भारत को बिना भारतीय नेताओं की सहमति के युद्ध में शामिल करने का फैसला जैसे कई कारण थे।

1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद ब्रिटेन ने भारत को भी युद्ध में शामिल कर दिया। कांग्रेस ने इसका विरोध किया। उसका तर्क था कि जिस देश को खुद राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल नहीं है, उससे लोकतंत्र की रक्षा के लिए युद्ध में सहयोग की उम्मीद करना उचित नहीं है।

1941 में जापान के युद्ध में प्रवेश के बाद हालात और बदल गए। जापानी सेना दक्षिण-पूर्व एशिया में तेजी से आगे बढ़ी और 1942 में बर्मा तक पहुंच गई। इससे ब्रिटिश भारत की सुरक्षा पर भी सीधा खतरा पैदा हो गया।

क्रिप्स मिशन से क्यों नहीं बनी बात?

भारतीय नेताओं का समर्थन हासिल करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1942 में सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। उनके प्रस्ताव में युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस देने और संविधान सभा के गठन की बात कही गई थी।

लेकिन कांग्रेस तत्काल सत्ता हस्तांतरण चाहती थी। भारतीय नेताओं की मांग थी कि देश की शासन व्यवस्था में भारतीयों को वास्तविक अधिकार दिए जाएं।

क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद कांग्रेस के भीतर यह भावना मजबूत हुई कि ब्रिटिश सरकार तत्काल स्वतंत्रता देने को तैयार नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में निर्णायक आंदोलन की तैयारी तेज हुई।

8 अगस्त 1942 को क्या हुआ?

मुंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में भारत छोड़ो प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्ताव पेश किया और सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसका समर्थन किया।

इसके बाद महात्मा गांधी ने देशवासियों से निर्णायक संघर्ष के लिए तैयार होने की अपील की। उनका ‘करो या मरो’ का संदेश जल्द ही स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख प्रतीक बन गया।

गांधीजी का जोर अहिंसक संघर्ष पर था। उनका उद्देश्य था कि भारतीय जनता ब्रिटिश शासन को यह स्पष्ट संदेश दे कि अब देश पर विदेशी शासन स्वीकार नहीं किया जाएगा।

नेताओं की गिरफ्तारी से आंदोलन और तेज क्यों हुआ?

ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन की गंभीरता को समझते हुए 9 अगस्त की सुबह ही कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। महात्मा गांधी को आगा खान पैलेस में नजरबंद किया गया, जबकि जवाहरलाल नेहरू समेत कई नेताओं को अलग-अलग स्थानों पर कैद किया गया।

अंग्रेजों को उम्मीद थी कि नेतृत्व को जेल में डालने के बाद आंदोलन कमजोर पड़ जाएगा।

लेकिन इसका उल्टा हुआ।

नेताओं की गिरफ्तारी की खबर फैलते ही देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन, हड़ताल और सरकारी संस्थानों के बहिष्कार शुरू हो गए। आंदोलन धीरे-धीरे शहरों से निकलकर गांवों तक पहुंच गया।

आंदोलन का स्वरूप कैसे बदला?

गांधीजी ने अहिंसा का रास्ता अपनाने की अपील की थी, लेकिन शीर्ष नेतृत्व के जेल में होने के कारण कई जगह आंदोलन स्वतःस्फूर्त रूप से आगे बढ़ा।

कई इलाकों में रेलवे लाइनों, टेलीग्राफ और संचार व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया गया। सरकारी कार्यालयों और अन्य संस्थानों के खिलाफ भी प्रदर्शन हुए।

इन घटनाओं में आंदोलन का एक उग्र रूप सामने आया, हालांकि कांग्रेस की आधिकारिक नीति अहिंसक संघर्ष की ही रही।

बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, महाराष्ट्र और ओडिशा समेत कई क्षेत्रों में आंदोलन का व्यापक प्रभाव देखने को मिला।

बनीं समानांतर सरकारें

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कुछ क्षेत्रों में स्थानीय लोगों ने ब्रिटिश प्रशासन को चुनौती देते हुए समानांतर प्रशासनिक व्यवस्था भी खड़ी की।

सातारा में ‘प्रति सरकार’ लंबे समय तक सक्रिय रही। बंगाल के तामलुक क्षेत्र में तम्रलिप्त राष्ट्रीय सरकार बनी, जबकि उत्तर प्रदेश के बलिया में भी कुछ समय के लिए स्थानीय प्रशासन ब्रिटिश नियंत्रण से बाहर चला गया।

इन प्रयासों ने यह संदेश दिया कि भारतीय जनता केवल स्वतंत्रता की मांग नहीं कर रही थी, बल्कि अपने स्तर पर प्रशासन चलाने की क्षमता भी रखती थी।

महिलाओं की भूमिका भी रही बेहद अहम

भारत छोड़ो आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी उल्लेखनीय रही। जब कांग्रेस के बड़े नेता जेल में थे, तब कई महिलाओं ने भूमिगत गतिविधियों और जनसंपर्क का जिम्मा संभाला।

अरुणा आसफ अली ने 9 अगस्त 1942 को ग्वालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराया और आंदोलन का प्रमुख चेहरा बन गईं।

उषा मेहता ने भूमिगत रहकर गुप्त कांग्रेस रेडियो के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके जरिए आंदोलन से जुड़ी सूचनाएं और संदेश लोगों तक पहुंचाए जाते थे।

इसके अलावा सुचेता कृपलानी और मातंगिनी हाजरा जैसी महिलाओं ने भी आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

अंग्रेजों ने आंदोलन को कैसे दबाया?

ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां और दमनात्मक कार्रवाई की। प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज और गोलीबारी की घटनाएं हुईं तथा कई इलाकों में सेना की तैनाती की गई।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आंदोलन के शुरुआती महीनों में बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया और सैकड़ों लोगों की मौत हुई। हालांकि स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े वास्तविक नुकसान का आकलन अलग-अलग स्रोतों में अलग मिलता है।

क्या भारत छोड़ो आंदोलन से ही मिली आजादी?

भारत को 1947 में मिली स्वतंत्रता के पीछे कई राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक कारणों का योगदान था। भारत छोड़ो आंदोलन अकेला कारण नहीं था, लेकिन इसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय जनमत और राजनीतिक दबाव को बेहद मजबूत कर दिया।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति कमजोर हुई। वहीं आजाद हिंद फौज से जुड़े घटनाक्रम, 1946 का नौसैनिक विद्रोह और भारत में लगातार बढ़ता राजनीतिक दबाव भी ब्रिटिश सरकार के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बने।

इस पूरे घटनाक्रम में भारत छोड़ो आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय जनता का संघर्ष अब व्यापक और निर्णायक रूप ले चुका है।

‘करो या मरो’ क्यों बना ऐतिहासिक संदेश?

‘करो या मरो’ सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं था। यह उस दौर की भारतीय जनता के संकल्प का प्रतीक बन गया था।

1942 में पहली बार स्वतंत्रता आंदोलन ने इतनी व्यापक जनभागीदारी देखी, जिसमें विद्यार्थी, किसान, महिलाएं और आम नागरिक बड़ी संख्या में शामिल हुए।

इसीलिए भारत छोड़ो आंदोलन को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन महत्वपूर्ण पड़ावों में गिना जाता है, जिसने आजादी की लड़ाई को निर्णायक चरण में पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई।

बेबाक24 टेक

भारत छोड़ो आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल उसका राजनीतिक प्रभाव नहीं, बल्कि जनभागीदारी और संचार के नए तरीकों का इस्तेमाल भी था।

जब कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व जेल में था, तब गुप्त रेडियो, भूमिगत नेटवर्क और स्थानीय संगठनों ने आंदोलन को जीवित रखने में अहम भूमिका निभाई। उस दौर में सीमित संचार साधनों के बावजूद आंदोलन का देश के अलग-अलग हिस्सों में फैलना बताता है कि स्वतंत्रता की मांग कितनी गहरी हो चुकी थी।

आज 84 साल बाद ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ भारतीय इतिहास में इस बात की याद दिलाता है कि बड़े राजनीतिक बदलाव केवल नेतृत्व से नहीं, बल्कि व्यापक जनभागीदारी से भी आकार लेते हैं।



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