by admin@bebak24.com on | 2026-08-08 11:03:49
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नई दिल्ली: अमेरिका में रूस और ईरान से तेल खरीदने वाले देशों पर सख्त कार्रवाई की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। अमेरिकी सीनेट ने ऐसा विधेयक पारित किया है, जो कानून बनने की स्थिति में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस और ईरान से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति दे सकता है।
सीनेट में इस विधेयक को भारी बहुमत मिला। प्रस्ताव के पक्ष में 86 वोट पड़े, जबकि 11 सांसदों ने इसका विरोध किया। अब विधेयक को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की मंजूरी की जरूरत होगी।
अगर यह प्रस्ताव कानून बन जाता है, तो भारत और चीन जैसे रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी व्यापार नीति का सीधा असर पड़ सकता है।
अमेरिकी सांसदों की इस पहल का मुख्य उद्देश्य रूस और ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना बताया जा रहा है। प्रस्ताव में उन देशों को भी निशाने पर लेने की व्यवस्था है, जो रूस से तेल और गैस खरीदकर उसकी अर्थव्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देते हैं।
विधेयक को रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों दलों के सांसदों का समर्थन मिलना खास माना जा रहा है। इससे संकेत मिलता है कि रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने के मुद्दे पर अमेरिकी संसद में व्यापक सहमति मौजूद है।
भारत रूस से कच्चे तेल का बड़ा खरीदार है। ऐसे में अगर नया कानून लागू होता है और भारत को इसके तहत टैरिफ के दायरे में रखा जाता है, तो दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों पर दबाव बढ़ सकता है।
प्रस्ताव में रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले शीर्ष पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान बताया गया है। भारत और चीन संभावित रूप से इस व्यवस्था के दायरे में आ सकते हैं।
इसका असर सिर्फ भारत-अमेरिका व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा। भारत की ऊर्जा खरीद, तेल की कीमतों और रणनीतिक विदेश नीति पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
विधेयक में रूस के खिलाफ कई अन्य कड़े प्रावधान भी शामिल हैं। इसके तहत रूसी सरकार के शीर्ष अधिकारियों पर अनिवार्य प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था है। इसमें राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी शामिल हैं।
इसके अलावा रूसी वित्तीय संस्थानों, ऊर्जा परियोजनाओं, सरकारी कंपनियों और रक्षा क्षेत्र को समर्थन देने वाली विदेशी कंपनियों पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रावधान प्रस्तावित है।
प्रस्ताव में अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए कुछ परिस्थितियों में प्रतिबंधों या टैरिफ से छूट देने का विकल्प भी रखा गया है।
हालांकि, ऐसी छूट को राष्ट्रीय हित में उचित ठहराने के लिए राष्ट्रपति को अमेरिकी कांग्रेस के सामने इसका प्रमाण देना होगा।
विधेयक में कुछ ऐसे देशों को भी संभावित छूट का प्रावधान बताया गया है, जो रूस के कुल प्राकृतिक गैस निर्यात का 15 प्रतिशत से कम आयात करते हैं या रूसी गैस पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं।
इस विधेयक को लेकर अमेरिकी राजनीति में मतभेद भी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सीनेट के रिपब्लिकन नेताओं ने शुरुआत में इसे वोटिंग के लिए आगे बढ़ाने से परहेज किया था, क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप पहले इसके विरोध में रहे थे।
ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही टैरिफ और प्रतिबंधों को अमेरिकी विदेश नीति के महत्वपूर्ण औजार के तौर पर इस्तेमाल करते रहे हैं।
अब सवाल यह है कि सीनेट की मंजूरी के बाद ट्रंप इस विधेयक को किस तरह देखते हैं और क्या वे इसके लागू होने की स्थिति में भारत जैसे देशों पर टैरिफ का इस्तेमाल करेंगे।
सीनेट में भारी बहुमत मिलने के बावजूद प्रतिनिधि सभा में इस विधेयक की राह पूरी तरह आसान नहीं मानी जा रही है।
कुछ अमेरिकी सांसदों को चिंता है कि राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की अतिरिक्त शक्ति देने से अमेरिकी आयातकों और आम उपभोक्ताओं की लागत बढ़ सकती है। इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था और रिपब्लिकन पार्टी दोनों पर राजनीतिक दबाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
डेमोक्रेट सांसद ग्रेगरी मीक्स और डॉन बेयर ने भी ट्रंप को टैरिफ संबंधी अतिरिक्त अधिकार देने को लेकर चिंता जाहिर की है।
इस प्रस्ताव का नाम दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के सम्मान में रखा गया है। ग्राहम इस कानून को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल थे।
विधेयक पहली बार अप्रैल 2025 में पेश किया गया था। जुलाई के दूसरे सप्ताह में 71 वर्ष की उम्र में ग्राहम के निधन के बाद सीनेट की मंजूरी को उनके लंबे प्रयासों की सफलता के तौर पर भी देखा जा रहा है।
अगर यह विधेयक अमेरिकी कानून बनता है और भारत को इसके तहत टैरिफ का सामना करना पड़ता है, तो भारत के सामने एक कठिन रणनीतिक चुनौती पैदा हो सकती है।
एक तरफ भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए सस्ती और स्थिर तेल आपूर्ति बनाए रखनी है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक और रणनीतिक साझेदार है।
ऐसे में नई अमेरिकी नीति भारत की ऊर्जा सुरक्षा, रूस के साथ संबंधों और रणनीतिक स्वायत्तता—तीनों की परीक्षा ले सकती है।
सीनेट से 86-11 के भारी बहुमत से पारित यह विधेयक सिर्फ रूस और ईरान पर दबाव बनाने की कोशिश नहीं है। अगर यह कानून बनता है, तो इसका असर उन देशों पर भी पड़ सकता है जो रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखते हैं।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाने की होगी। रूस से तेल खरीदना भारत की ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जबकि अमेरिका के साथ रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते भी लगातार मजबूत हुए हैं।
हालांकि, अभी इसे अंतिम अमेरिकी कानून मानना जल्दबाजी होगी। प्रतिनिधि सभा की मंजूरी, राष्ट्रपति की भूमिका और संभावित छूट जैसे कई चरण बाकी हैं। इसलिए फिलहाल 100% टैरिफ का खतरा एक संभावित नीति है, तत्काल लागू हुआ शुल्क नहीं।
आने वाले दिनों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहेगा—क्या अमेरिका रूस पर दबाव बनाने के लिए भारत जैसे बड़े ऊर्जा खरीदारों के खिलाफ वास्तव में 100% टैरिफ का इस्तेमाल करेगा, या दोनों देशों के बीच कोई कूटनीतिक रास्ता निकलेगा?
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