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राजनीति या व्यक्तिगत रंजिश? राजभर के 'कंसवंशी' हमले पर सीधी बात

by on | 2026-08-08 10:34:04

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राजनीति या व्यक्तिगत रंजिश? राजभर के 'कंसवंशी' हमले पर सीधी बात

संतोष राय

वाराणसी । ​उत्तर प्रदेश की राजनीति में बयानों के तीर चलना कोई नई बात नहीं है, लेकिन सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के मुखिया और कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने इस बार मर्यादा और भाषा की तमाम सीमाएं लांघ दी हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात अभी से बिछाई जा रही है, और इस बिसात पर राजभर का सबसे पसंदीदा निशाना बने हैं समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव।

​लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या राजनीति में वैचारिक मतभेदों की जगह अब सीधे 'कंसवंशी' और 'राक्षस' जैसे शब्दों ने ले ली है?

सोशल मीडिया पर 'सीरीज War': मुद्दा या सिर्फ टीआरपी?

​ओपी राजभर अपने X (ट्विटर) हैंडल से प्रतिदिन अखिलेश यादव को घेरने के लिए एक नई कड़ी जारी कर रहे हैं। इस ताजा प्रहार में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के वंश का हवाला देते हुए अखिलेश यादव को 'कृष्ण नहीं, कंसवंशी' करार दे दिया। बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं हुई, 2024 के चुनाव में जीतकर आए सपा के 37 सांसदों की तुलना राक्षसों से कर डाली।

​राजनीति में विरोधियों पर हमला करना समझ आता है, मगर किसी पूरी राजनीतिक पार्टी के प्रतिनिधियों को 'राक्षस' या 'पागल' बता देना यह दर्शाता है कि यूपी की चुनावी बहसों का स्तर किस कदर गिर चुका है।

'पीडीए' की आड़ में गाजीपुर और अमेठी की घटनाओं पर घेराव

​अखिलेश यादव द्वारा 'PDA' की नई-नई व्याख्याओं (जैसे 'पंडित') पर चुटकी लेते हुए राजभर ने गंभीर आरोप दागे हैं। गाजीपुर में दो मासूम बच्चियों (आंचल और चांदनी) के साथ हुई कथित बर्बरता और अमेठी में अति पिछड़े कश्यप समाज के युवक की हत्या का मामला उठाते हुए राजभर ने सपा के समर्थकों को "सामंती यादव" और "अहिर गुंडे" तक कह दिया।

​अपराध चाहे कहीं भी हो और अपराधी चाहे किसी भी जाति का हो, उस पर सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई होनी ही चाहिए—इस पर दो राय नहीं हो सकती। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी आपराधिक घटना को तुरंत जातीय और पौराणिक खलनायकों के तमगों से जोड़कर राजनीतिक रोटियां सेकना एक जिम्मेदार कैबिनेट मंत्री को शोभा देता है?

"20 गौतमपल्ली आ जाओ..."— यह चुनौती है या सियासी ड्रामा?

​राजभर यहीं नहीं रुके; उन्होंने अपने सरकारी आवास (20 गौतमपल्ली, लखनऊ) का पता देकर सपा समर्थकों को खुलेआम 'दम' दिखाने की चुनौती दे डाली।

​इतिहास गवाह है कि 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यही राजभर एनडीए छोड़ सपा के साथ पीला गमछा डाले घूम रहे थे और अखिलेश यादव की बदौलत ही उनके 6 विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। चुनाव खत्म होते ही पाला बदलकर फिर से सत्ता की मलाई छानने योगी सरकार में शामिल हो गए। ऐसे में जनता यह भली-भांति समझती है कि "आज जो सबसे बड़ा दुश्मन है, कल वही सबसे प्यारा मित्र था।"

सपा की चुप्पी: समझदारी या खामोश रणनीति?

​दिलचस्प बात यह है कि ओपी राजभर के इतने तल्ख और सीधे हमलों के बावजूद समाजवादी पार्टी की तरफ से फिलहाल कोई आधिकारिक पलटवार नहीं किया गया है। सपा की यह खामोशी दो इशारे करती है—या तो वे राजभर को तवज्जो देकर उनका राजनीतिक कद बढ़ाना नहीं चाहते, या फिर वे इसे राजभर का 'अटेंशन सीकिंग' स्टंट मानकर नजरअंदाज कर रहे हैं।

बेबाक बात:

यूपी की जनता विकास, रोजगार, कानून-व्यवस्था और महंगाई जैसे ठोस मुद्दों पर जवाब चाहती है। राजभर जी, मंत्री पद पर बैठकर 'कंसवंशी', 'राक्षस' और '20 गौतमपल्ली आने' जैसी बयानबाजी से सुर्खियां तो बटोरी जा सकती हैं, लेकिन जनता के असली सवालों के जवाब नहीं दिए जा सकते। राजनीति को 'टीवी सीरियल का ड्रामा' बनाने के बजाय अगर जनता के मुद्दों पर बात हो, तो बेहतर होगा!



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