by on | 2026-07-19 20:16:14
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नई दिल्ली: 18वीं लोकसभा के 9वें संसदीय सत्र यानी मॉनसून सत्र के शुरू होने से ठीक 24 घंटे पहले देश की सियासत में भूचाल आ गया है। रविवार को सरकार द्वारा बुलाई गई पारंपरिक सर्वदलीय बैठक में उस वक्त हाई-वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला, जब कांग्रेस, टीएमसी, सपा और डीएमके सहित पूरे विपक्ष ने एक सुर में बैठक का बहिष्कार करते हुए वॉकआउट कर दिया।
विपक्ष के इस आक्रामक रुख ने साफ कर दिया है कि 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चलने वाला यह मॉनसून सत्र बेहद हंगामेदार होने वाला है। विवाद की मुख्य जड़ तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों को सरकार द्वारा बैठक में आमंत्रित किया जाना है।
संसद भवन एनेक्सी के मुख्य समिति कक्ष में सुबह 11 बजे जैसे ही केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री की अध्यक्षता में बैठक शुरू हुई, वैसे ही विपक्षी खेमे ने टीएमसी के बागी धड़े की मौजूदगी पर तीखा ऐतराज जताया।
टीएमसी की फायरब्रांड सांसद महुआ मोइत्रा ने बैठक से बाहर निकलकर सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा:
महुआ मोइत्रा का तीखा प्रहार: "आज पूरे विपक्ष ने एकजुट होकर ऑल पार्टी मीटिंग से वॉकआउट किया है। सरकार ने तथाकथित 'NCPI' (बागी गुट) को बैठक में आमंत्रित किया है, जो कि कोई मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल नहीं है। टेबल ऑफिस की आधिकारिक सूची में अभी भी टीएमसी की सांसद संख्या 28 दिखाई गई है। ऐसे में संसदीय कार्य मंत्री ने इन 20 बागी सांसदों को किस हैसियत से और किस आधार पर देश की सर्वदलीय बैठक में बिठाया?"
मोइत्रा ने आगे याद दिलाया कि 91वें संविधान संशोधन के बाद संसद में किसी अलग छोटे समूह या धड़े को सीधे मान्यता देने का कोई प्रावधान नहीं है। इन 20 बागी सांसदों के विलय को स्पीकर ओम बिरला ने अभी तक आधिकारिक मंजूरी नहीं दी है और इन सभी के खिलाफ दलबदल कानून के तहत अयोग्यता की याचिकाएं लंबित हैं।
टीएमसी के इस विरोध को कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और डीएमके का खुला और मजबूत साथ मिला। कांग्रेस के वरिष्ठ राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी ने वॉकआउट की पुष्टि करते हुए कहा:
विपक्षी एकजुटता: "यह सिर्फ टीएमसी का मामला नहीं है। सरकार लगातार संविधान की अवहेलना कर रही है। टीएमसी, आम आदमी पार्टी और शिवसेना के साथ जो कुछ भी अलोकतांत्रिक कृत्य किए गए हैं, उनके विरोध में और देश के संविधान की रक्षा के लिए कांग्रेस ने पूरे विपक्ष के साथ बैठक से वॉकआउट किया है।"
यह सर्वदलीय बैठक हर सत्र से पहले इसलिए बुलाई जाती है ताकि सरकार और विपक्ष मिलकर संसद को सुचारू रूप से चलाने के लिए विधायी कार्यों पर चर्चा कर सकें। लेकिन सत्र शुरू होने के एक दिन पहले ही इस तरह के गतिरोध ने सरकार की रणनीतियों पर पानी फेर दिया है। 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलने वाले इस सत्र में अब विपक्ष कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है:
बागी सांसदों का मुद्दा: लोकसभा के भीतर बागी गुटों को बैठने की व्यवस्था और उनकी वैधानिकता पर सोमवार को ही सदन में भारी हंगामा तय है।
सड़क और सदन का गठजोड़: दिल्ली के जंतर-मंतर पर परीक्षाओं में धांधली को लेकर सीजेपी का 'चलो संसद' मार्च और सोनम वांगचुक की अस्पताल में नजरबंदी का मुद्दा भी सोमवार को विपक्ष संसद के भीतर जोर-शोर से उठाएगा।
संसदीय लोकतंत्र परंपराओं और नियमों से चलता है, न कि सत्ता के संख्या बल के अहंकार से। जब तक लोकसभा अध्यक्ष किसी बागी धड़े या नई पार्टी को सदन के भीतर आधिकारिक तौर पर मान्यता नहीं दे देते, तब तक संसदीय कार्य मंत्रालय द्वारा उन्हें 'सर्वदलीय बैठक' जैसी महत्वपूर्ण नीतिगत चर्चा में आमंत्रित करना नियमों की खुली धज्जी उड़ाना है। महुआ मोइत्रा का यह सवाल बिल्कुल जायज है कि जो सांसद अभी तकनीकी और कानूनी रूप से अयोग्यता के दायरे में हैं, वे देश के विधायी कार्यों का एजेंडा कैसे तय कर सकते हैं?
बेबाक24 का राजनीतिक विश्लेषण कहता है कि सरकार ने इस सत्र से पहले विपक्ष को खुद एक ऐसा मुद्दा थमा दिया है, जिसने बंटे हुए विपक्ष को एक मंच पर ला खड़ा किया है। प्रमोद तिवारी का बयान साफ करता है कि कांग्रेस अब क्षेत्रीय दलों की संप्रभुता पर हो रहे हमलों को अपना मुद्दा बना रही है। संसद के पहले ही दिन सोमवार को यदि स्पीकर ओम बिरला ने इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं की, तो मॉनसून सत्र की शुरुआत ही भारी गतिरोध और हंगामे के साथ होगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार के इस अपरिपक्व निमंत्रण पर जाती है।
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