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सोनम वांगचुक की डिटेंशन के बाद क्या थम जाएगा CJP का 'चलो संसद' मार्च? जंतर-मंतर पर भारी तनाव, अब सीधे PM मोदी के इस्तीफे की मांग

by on | 2026-07-19 16:20:45

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सोनम वांगचुक की डिटेंशन के बाद क्या थम जाएगा CJP का 'चलो संसद' मार्च? जंतर-मंतर पर भारी तनाव, अब सीधे PM मोदी के इस्तीफे की मांग

नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर बड़े छात्र-युवा आंदोलन का केंद्र बन गया है। देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार और परीक्षाओं में हुई हालिया गड़बड़ियों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे प्रख्यात पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को अनशन के 21वें दिन शनिवार सुबह दिल्ली पुलिस ने जबरन उठा लिया। हाई कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए पुलिस उन्हें सफदरजंग अस्पताल ले गई है, जिसके बाद जंतर-मंतर पर आक्रोश भड़क उठा है।

इस कार्रवाई के तुरंत बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने आंदोलन को और तेज करने का एलान कर दिया है।

'चलो संसद' मार्च पर अड़ी CJP; अभिजीत दीपके अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे

सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाए जाने के बाद भी आंदोलन थमता नजर नहीं आ रहा है। सीजेपी (CJP) ने साफ कर दिया है कि वे पीछे हटने वाले नहीं हैं:

  • नया अनशन शुरू: वांगचुक को अस्पताल भेजे जाने के तुरंत बाद सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके जंतर-मंतर पर ही अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं। उनके साथ छात्र संगठन एआईएसए (AISA) के तीन सदस्य (नेहा, मनीष और आमीन) भी 28 जून से लगातार भूख हड़ताल पर हैं।

  • 20 जुलाई का मार्च तय: संसद के मॉनसून सत्र के पहले दिन यानी सोमवार, 20 जुलाई 2026 को होने वाला 'चलो संसद' शांतिपूर्ण मार्च अपने तय कार्यक्रम के अनुसार ही जारी रहेगा। वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे अंगमो ने स्पष्ट किया है कि अस्पताल में होने के बावजूद उनके पति का अनशन जारी है और उन्होंने ड्रिप या किसी भी तरह के शुगर (तरल पदार्थ) को लेने से पूरी तरह मना कर दिया है।

'वाइटल्स वांगचुक के नहीं, मोदी सरकार के डाउन थे' — योगेंद्र यादव

शुरुआत से ही इस आंदोलन को अपना समर्थन दे रहे वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने दिल्ली पुलिस की इस कार्रवाई को बेहद कायरतापूर्ण करार दिया है। जंतर-मंतर से वीडियो जारी करते हुए उन्होंने कहा:

योगेंद्र यादव का तीखा हमला: "दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचुक को सफेद चादर में इस तरह बांधकर उठाया जैसे इस देश में किसी ज़िंदा इंसान को कभी नहीं ले जाया जाता। बहाना कोर्ट के आदेश का था, लेकिन किसी डॉक्टर ने यह नहीं कहा था कि उनके वाइटल्स डाउन हैं। असल में वाइटल्स मोदी सरकार के डाउन हो चुके थे। इस दमन का नतीजा यह हुआ है कि आंदोलन में ऊर्जा और बढ़ गई है। अब सिर्फ शिक्षा मंत्री का नहीं, बल्कि सीधे प्रधानमंत्री मोदी का इस्तीफा मांगा जाएगा। यह अब एक 'व्यवस्था विरोधी' आंदोलन बन चुका है।"

क्या बैकफायर करेगा सरकार का यह कदम? ग्राउंड रिपोर्ट

पहले दिन से इस आंदोलन को कवर कर रहीं स्वतंत्र पत्रकार स्मिता शर्मा के मुताबिक, दिल्ली पुलिस की इस कार्रवाई ने आंदोलन में घी डालने का काम किया है:

  1. युवाओं का बढ़ता सैलाब: शनिवार को कार्रवाई के बाद जंतर-मंतर पर अचानक युवाओं और आम जनता की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है। वांगचुक की टीम के लोग पुलिसिया बर्ताव को देखकर रो पड़े, जिसने इस आंदोलन को एक बेहद भावुक मोड़ दे दिया है।

  2. रणनीति में बदलाव की वजह: स्मिता शर्मा का विश्लेषण है कि हाल ही में दिल्ली पुलिस कमिश्नर के बदले जाने के तुरंत बाद यह एक्शन हुआ। सरकार इस बात से असहज थी कि 21 दिनों से एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का कार्यकर्ता दिल्ली के दिल में अनशन पर बैठा है।

  3. संसद सत्र में हंगामे के आसार: 20 जुलाई से संसद का मॉनसून सत्र शुरू हो रहा है। विपक्षी दल पहले ही इस आंदोलन को समर्थन दे चुके हैं। ऐसे में यदि पुलिस सोमवार को मार्च रोकने के लिए बल प्रयोग करती है, तो विपक्षी सांसद भी जंतर-मंतर पर आकर बैठ सकते हैं, जिससे यह कदम सरकार पर ही भारी पड़ सकता है।

बेबाक24 टेक

इतिहास गवाह है कि जब-जब युवाओं और छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन को दबाने के लिए सत्ता ने पुलिसिया बल का प्रयोग किया है, वह आंदोलन खत्म होने के बजाय और ज्यादा फैल गया है। सोनम वांगचुक जैसे शांत और सम्मानित चेहरे को, जो देश की बर्बाद होती शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य (पेपर लीक व परीक्षा धांधली) के लिए लड़ रहे हैं, एक अपराधी की तरह जंतर-मंतर से घसीटकर अस्पताल पहुंचाना लोकतांत्रिक मर्यादाओं का हनन है। सरकार का यह रवैया बिल्कुल वैसा ही है जैसा उसने पहलवानों के आंदोलन के वक्त दिखाया था।

बेबाक24 का राजनीतिक विश्लेषण कहता है कि सीजेपी (CJP) का 'चलो संसद' मार्च भले ही दिल्ली पुलिस सोमवार को भारी बैरिकेडिंग और बल प्रयोग के जरिए संसद भवन तक न पहुंचने दे, लेकिन इस आंदोलन की गूंज को दबाना अब नामुमकिन हो चुका है। सरकार को यह समझना होगा कि यह लड़ाई अब सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की नहीं रह गई है, बल्कि यह उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ युवाओं का हुंकार है जो न तो पारदर्शी परीक्षा दे पा रही है और न ही रोजगार। यदि रविवार और सोमवार को पुलिस ने दोबारा क्रूरता दिखाई, तो यह आंदोलन देशव्यापी छात्र आंदोलन का रूप ले सकता है, जिसकी आंच को संभालना सरकार के लिए बेहद मुश्किल होगा।



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