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होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अटका अमेरिका-ईरान समझौता; जंग की आहट या कूटनीतिक शांति, किस ओर बढ़ेगा पश्चिम एशिया?

by on | 2026-07-19 16:09:52

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होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अटका अमेरिका-ईरान समझौता; जंग की आहट या कूटनीतिक शांति, किस ओर बढ़ेगा पश्चिम एशिया?

वॉशिंगटन/तेहरान: पश्चिम एशिया एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठ गया है। गत 17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच जिस अस्थायी समझौते  ने दुनिया को राहत की सांस दी थी, वह अब पूरी तरह खटाई में पड़ता नजर आ रहा है। वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा माने जाने वाले होर्मुज़ स्ट्रेट को लेकर दोनों महाशक्तियों के बीच 'गलतफहमी का नया दौर' शुरू हो चुका है, जिसने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं और तेल की कीमतों को हिलाकर रख दिया है।


समझौता ज्ञापन या गलतफहमियों का पुलिंदा?

17 जून को हुए इस अस्थायी समझौते को लेकर अमेरिका और ईरान दोनों के दावे बिल्कुल विपरीत हैं, जिसके चलते यह समझौता अब युद्ध की नई वजह बन गया है:

  • अमेरिका का दावा: वॉशिंगटन का कहना है कि इस समझौते के तहत होर्मुज़ स्ट्रेट अंतरराष्ट्रीय जहाजों के आवागमन के लिए पूरी तरह खुला रहेगा और इस पर कोई टैक्स नहीं लगेगा।

  • ईरान का दावा: तेहरान का मानना है कि इस समझौते के जरिए अमेरिका ने होर्मुज़ स्ट्रेट पर ईरान के संप्रभु अधिकार को स्वीकार कर लिया है। अब ईरान अपनी मर्जी से यहां टैक्स वसूल रहा है और बिना अनुमति गुजरने वाले जहाजों पर सैन्य कार्रवाई कर रहा है, जिसमें कई भारतीय नाविक भी प्रभावित हुए हैं।

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और मिस्र में भारत के पूर्व राजदूत नवदीप सूरी ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा:

नवदीप सूरी का बयान: "दोनों देश इस MoU को अपनी-अपनी सहूलियत से परिभाषित कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि यह 'मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' नहीं, बल्कि 'मेमोरेंडम ऑफ मिसअंडरस्टैंडिंग' बन चुका है। यह डील डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा बेहद जल्दबाजी में की गई थी, जिसके चलते कोर इश्यूज (मुख्य विवाद) वहीं के वहीं रह गए।"

ईरान का आंतरिक मूड: अली ख़ामेनेई की मौत का बदला और जंग की आमादगी

हाल ही में ईरान का दौरा करके लौटे पश्चिम एशिया मामलों के विशेषज्ञ अशरफ़ ज़ैदी ने तेहरान के जमीनी हालातों पर चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। 5 जुलाई को ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान ईरानी जनता का गुस्सा चरम पर था:

  • ट्रंप विरोधी भावनाएं: ईरान के चौराहों पर ट्रंप की हत्या की मांग करने वाले बैनर और नारे देखे गए। ईरानी जनता का एक बड़ा वर्ग इस बात से नाराज है कि सरकार ने अमेरिका के साथ समझौता क्यों किया।

  • अमेरिकी ठिकानों का खात्मा: वहां की कौम का मानना है कि क्षेत्र में शांति का एकमात्र रास्ता अमेरिकी सैन्य ठिकानों का पूरी तरह खात्मा है। वे इस जंग को 'अमेरिका द्वारा थोपा हुआ' मान रहे हैं।

  • नए सर्वोच्च नेता पर भरोसा: जनता वर्तमान सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई के सार्वजनिक रूप से सामने न आने को लेकर संतुष्ट है, क्योंकि युद्ध के इस दौर में उनका महफ़ूज़ रहना मुल्क के लिए सबसे जरूरी है।

विशेषज्ञ चेतावनी: अशरफ़ ज़ैदी और नवदीप सूरी का मानना है कि यदि ईरान ने होर्मुज़ पर अवैध टोल वसूलना जारी रखा, तो वह वैश्विक स्तर पर मिलने वाली उस सांत्वना को खो देगा जो उसे एक छोटे देश के रूप में अमेरिका से लड़ने के कारण मिलती रही है, क्योंकि इसका सीधा असर दुनिया की ऊर्जा कीमतों पर पड़ रहा है।

परमाणु कार्यक्रम भूला अमेरिका, अब एकमात्र लक्ष्य— 'होर्मुज़ खुलवाना'

वरिष्ठ पत्रकार सीमा सिरोही ने वॉशिंगटन से इस इनपुट को साझा करते हुए बताया कि अमेरिका के लिए अब इस पूरे संघर्ष का टर्निंग पॉइंट बदल चुका है:

  1. बदले लक्ष्य: अमेरिका अब ईरान में सत्ता परिवर्तन या उसके परमाणु कार्यक्रम को रोकने के एजेंडे को पीछे छोड़ चुका है। ट्रंप प्रशासन का एकमात्र तात्कालिक लक्ष्य किसी भी तरह 28 फरवरी से पहले वाली स्थिति बहाल करना है, ताकि होर्मुज़ से तेल के टैंकर बिना टैक्स के आ-जा सकें।

  2. घरेलू मजबूरी: अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की रेटिंग इस समय न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है और नवंबर में देश में मध्यवर्ती चुनाव होने हैं। तेल की बढ़ती कीमतों के कारण अमेरिकी जनता में भारी नाराजगी है, इसलिए ट्रंप प्रशासन युद्ध के बजाय दोबारा वार्ता की मेज पर लौटने के लिए छटपटा रहा है। ईरानी मुख्य सलाहकार गालिबाफ़ ने भी कूटनीतिक रास्ता खुला होने के संकेत दिए हैं।

भारतीय कूटनीति पर उठे सवाल: क्या दिल्ली की चुप्पी भारी पड़ी?

इस पूरे संकट का सीधा असर भारत पर पड़ रहा है, क्योंकि मर्चेंट नेवी में बड़ी संख्या में भारतीय नाविक कार्यरत हैं और भारत की ऊर्जा सुरक्षा खाड़ी देशों पर निर्भर है। पूर्व राजदूत नवदीप सूरी और सीमा सिरोही ने भारत के मौजूदा रुख की तीखी समीक्षा की है:

  • एकतरफा झुकाव का नुकसान: नवदीप सूरी के मुताबिक, 28 फरवरी को जब अमेरिका ने ईरान पर हमला किया था, तब भारत को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उसकी निंदा करनी चाहिए थी। भारत ने ऐसा न करके सीधे तौर पर अमेरिका और इजरायल का पक्ष चुन लिया, जिससे उसकी क्रेडिबिलिटी (विश्वसनीयता) कम हुई और इसका फायदा उठाकर पाकिस्तान ने इस क्षेत्र में अपनी कूटनीतिक चाल चल दी।

  • प्रतिनिधिमंडल का स्तर छोटा: ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार में भारत द्वारा भेजे गए प्रतिनिधिमंडल का स्तर कम से कम उपराष्ट्रपति स्तर का होना चाहिए था, जिससे हमारी कूटनीतिक सक्रियता दिखती।

  • ऊर्जा प्रबंधन की तारीफ: हालांकि, सूरी ने माना कि भारत सरकार ने अपने संबंधों के चलते तेल के स्रोतों को डायवर्सिफाई (विविध) किया और संकट को परिपक्वता से संभाला। लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि भारत को अपने 'रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व' को दो से तीन गुना बढ़ाना होगा।

  • मर्चेंट नेवी की सुरक्षा: सरकार सिर्फ एडवाइज़री जारी कर सकती है कि नाविक संघर्ष क्षेत्रों वाले जहाजों पर न जाएं, लेकिन यह कंपनियों पर निर्भर करता है।

बेबाक24 टेक

होर्मुज़ स्ट्रेट का यह संकट यह साबित करता है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में जब नीतियां 'लॉन्ग-टर्म विज़न' के बजाय चुनावी फायदों (जैसे ट्रंप की रेटिंग सुधारना) को देखकर जल्दबाजी में बनाई जाती हैं, तो वे समझौतों के बजाय युद्ध का दस्तावेज बन जाती हैं। ईरान के पास होर्मुज़ के रूप में जो भौगोलिक और रणनीतिक बढ़त है, वह आज भी कायम है और उसने अमेरिका जैसे सुपरपावर को घुटनों पर ला दिया है।

बेबाक24 का कूटनीतिक विश्लेषण कहता है कि भारत के संदर्भ में पूर्व राजदूत नवदीप सूरी और सीमा सिरोही की चिंताएं बेहद जायज हैं। नई दिल्ली का इस संवेदनशील मुद्दे पर 'एकदम चुपचाप' बैठना वैश्विक महाशक्ति बनने की उसकी आकांक्षाओं को कमजोर करता है। गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता की दुहाई देने वाले भारत को इस समय मूकदर्शक बने रहने के बजाय एक मध्यस्थ की सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। यदि होर्मुज़ पूरी तरह ब्लॉक होता है, तो भारत में महंगाई और ईंधन की कीमतें सरकार के नियंत्रण से बाहर हो जाएंगी। इसलिए, दिल्ली को वाशिंगटन और तेहरान दोनों के साथ अपने मजबूत रिश्तों का इस्तेमाल कर वार्ता की मेज सजाने की पहल तुरंत करनी चाहिए।



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