by admin@bebak24.com on | 2026-06-08 21:45:37
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नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े और गहरे सियासी संकट से गुजर रही है। राज्य विधानसभा में भारी बगावत झेलने के बाद अब ममता बनर्जी की पार्टी के संसदीय दल में भी दो-फाड़ की स्थिति बन गई है। दिल्ली में सियासी सरगर्मी उस समय सातवें आसमान पर पहुंच गई, जब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी खुद टीएमसी की कद्दावर सांसद शताब्दी रॉय के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर उनसे मिलने पहुंचे।
इस बैठक के दौरान टीएमसी सांसद जून मालिया समेत पार्टी के कई अन्य असंतुष्ट सांसदों की मौजूदगी ने इन अटकलों को और हवा दे दी है कि ममता बनर्जी का किला अब ढहने की कगार पर है।
टीएमसी के बागी गुट का नेतृत्व कर रही सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने सोमवार को एक ऐसा दावा किया जिसने विपक्षी खेमे में हड़कंप मचा दिया:
स्पीकर को पत्र: काकोली घोष का दावा है कि टीएमसी के करीब 20 लोकसभा सांसदों ने स्पीकर ओम बिरला को पत्र सौंपकर एनडीए (NDA) को समर्थन देने का एलान कर दिया है।
समीकरण और दलबदल कानून: लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसद हैं (बशीरहाट सीट सांसद हाजी नुरुल इस्लाम के निधन के बाद खाली है)। दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) से बचने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी कम से कम 18 सांसदों की आवश्यकता होती है। यदि 20 सांसदों का दावा सच है, तो यह गुट बिना किसी कानूनी अड़चन के अलग होने में सक्षम है।
इससे पहले दिन की शुरुआत में ही टीएमसी को राज्यसभा में भी तगड़ा झटका लगा। पार्टी के पूर्व मुख्य सचेतक (Chief Whip) और वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर रॉय ने सांसद पद और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता दोनों से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देने के बाद उन्होंने ममता बनर्जी पर बेहद तीखे और गंभीर आरोप लगाए:
"आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले को लेकर राज्य का नेतृत्व जमीनी हकीकत से पूरी तरह कट चुका है। सत्ता उनके सिर पर इस हद तक चढ़ गई थी कि उन्हें लगता था कि दुनिया में कोई उन्हें छू नहीं सकता। पिछले 15 सालों से मलाई खा रहे मंत्री, पंचायत नेता और मेयर जनता की पहुंच से बाहर हैं, जबकि जमीनी कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर दिया गया है।"
बगावत की खबरों के बीच दिल्ली में मौजूद टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद और पार्टी प्रवक्ता कुणाल घोष ने मोर्चा संभाला और इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया:
13 सांसदों की बैठक: कीर्ति आजाद ने दावा किया कि 20 सांसदों की बात झूठ है, केवल 13 सांसदों ने भाजपा नेता भूपेंद्र यादव से मुलाकात की थी।
व्हिप का विवाद: आजाद ने स्पष्ट किया कि काकोली घोष खुद को मुख्य सचेतक बताकर अवैध रूप से पत्र लिख रही हैं, जबकि पिछले महीने ही ममता बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष को सूचित कर काकोली की जगह कल्याण बनर्जी को नया मुख्य सचेतक नियुक्त कर दिया था।
जनता का अपमान: कुणाल घोष ने बागियों पर निशाना साधते हुए कहा, "जो कल तक 'दीदी-दीदी' का नारा लगाकर चुनाव जीते, वे आज एनडीए की गोद में जाने की बात कर रहे हैं। जनता ऐसी गद्दारी को कभी स्वीकार नहीं करेगी।"
यह सियासी संकट ममता बनर्जी के लिए इसलिए भी घातक है क्योंकि पश्चिम बंगाल में पहले ही करीब 58 विधायकों ने पार्टी से अलग होकर ममता और अभिषेक बनर्जी के खिलाफ खुला मोर्चा खोल रखा है। अब दिल्ली में ममता बनर्जी की मौजूदगी के दौरान ही उनके सांसदों का यह विद्रोह पार्टी पर शीर्ष नेतृत्व की कमजोर होती पकड़ को उजागर करता है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि क्या पश्चिम बंगाल में भी महाराष्ट्र जैसा 'शिवसेना बनाम शिंदे' वाला खेल दोहराया जाने वाला है।
यह टीएमसी के इतिहास का टर्निंग पॉइंट (Turning Point) साबित हो सकता है। सुखेंदु शेखर रॉय जैसे कद्दावर और बौद्धिक चेहरे का आरजी कर मामले को आधार बनाकर इस्तीफा देना यह साफ करता है कि पार्टी के भीतर अंदरूनी असंतोष केवल सत्ता की मलाई के लिए नहीं, बल्कि नीतिगत और नैतिक मोर्चे पर भी है।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का खुद शताब्दी रॉय के घर जाना यह दिखाता है कि बीजेपी इस बार टीएमसी के भीतर लगी आग को पूरी तरह हवा देने के लिए तैयार बैठी है। अगर काकोली घोष का 20 सांसदों का गणित लोकसभा स्पीकर के सामने सही साबित हो जाता है, तो यह राष्ट्रीय कूटनीति में ममता बनर्जी के राजनीतिक रसूख को जमींदोज कर देगा और पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार की स्थिरता पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा।
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