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उत्तर प्रदेश ग्राम पंचायत चुनाव: हाईकोर्ट की 'सुप्रीम' फटकार; हुक्मरानों की सुस्ती पर चला अदालती हंटर!

by on | 2026-06-05 17:45:16

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उत्तर प्रदेश ग्राम पंचायत चुनाव: हाईकोर्ट की 'सुप्रीम' फटकार; हुक्मरानों की सुस्ती पर चला अदालती हंटर!

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र की सबसे छोटी और सबसे जरूरी इकाई यानी 'ग्राम पंचायतें' इस वक्त अफसरों की जेब में बंद हैं। जनता के चुने हुए प्रधानों की जगह सरकारी प्रशासक मौज काट रहे हैं, और सरकार? सरकार आराम से बैठी है। लेकिन अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार की इस सुस्ती पर ऐसा हंटर चलाया है कि प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।

​'खबर दो बेबाक 24' की बेबाक शैली में समझिए कि कैसे कोर्ट ने सरकार के ढुलमुल रवैए की धज्जियां उड़ाई हैं और क्यों यूपी का ग्रामीण लोकतंत्र इस वक्त वेंटिलेटर पर है।

​ "जब सब पता था, तो अब तक सो क्यों रहे थे?" – हाईकोर्ट का तीखा सवाल

​न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान सरकार को आड़े हाथों लेते हुए साफ कहा कि ओबीसी आरक्षण का मामला कोई आज का नहीं है, यह लंबे समय से सरकार के संज्ञान में था। फिर भी प्रक्रिया अधर में क्यों लटकी है?

कोर्ट की दो टूक:

"ऐसा लगता है कि सरकार के लिए यह प्रक्रिया कभी न खत्म होने वाला सिलसिला बन गई है। नियमानुसार इसमें छह महीने का समय लगता है, लेकिन यहाँ तो कछुआ गति भी शरमा जाए। पंचायतों का लोकतांत्रिक स्वरूप और समयबद्ध चुनाव कोई चॉइस नहीं, बल्कि संवैधानिक मजबूरी है!"


​ डेडलाइन फिक्स: 10 जुलाई तक देना होगा पूरा हिसाब

​आशीष कुमार सिंह, ओम प्रकाश प्रजापति और खुशीराम की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने अब ढिलाई की सारी गुंजाइशें खत्म कर दी हैं।

  • 10 जून 2026: राज्य निर्वाचन आयोग मतदाता सूची का प्रकाशन करेगा।
  • 10 जुलाई 2026: ओबीसी आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग को हर हाल में पंचायत चुनावों की प्रगति रिपोर्ट कोर्ट के सामने पेश करनी होगी।

पेच कहाँ फंसा है?

याचिकाकर्ताओं ने सरकार के उस तुगलकी फरमान (शासनादेश) को चुनौती दी है, जिसके तहत कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रधानों की जगह सरकारी प्रशासकों को बैठा दिया गया। यह सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 243-ई की भावना का कत्ल है, जो कहता है कि पांच साल पूरे होने से पहले चुनाव हो जाने चाहिए।



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