by on | 2026-06-04 21:51:32
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इलाहाबाद।
उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था और पुलिसिया कार्रवाई पर एक बार फिर देश की उच्च अदालत ने बेहद सख्त और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद रिजवान जहीर और उनके दामाद रमीज नेमत पर साल 2024 में लगाए गए गैंगस्टर एक्ट को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जो टिप्पणी की है, उसने सीधे तौर पर पुलिस की हड़बड़ी और लचर जांच को बेनकाब कर दिया है।
अदालत का यह रुख साफ करता है कि कानून की धाराएं किसी को फंसाने का हथियार नहीं, बल्कि इंसाफ का जरिया होनी चाहिए। आइए आपको बताते हैं क्या है यह पूरा मामला और क्यों कोर्ट की इस फटकार से पुलिस बैकफुट पर आ गई है।
मामला जनवरी 2022 का है, जब यूपी विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां चरम पर थीं। 4 जनवरी 2022 को तुलसीपुर के पूर्व चेयरमैन फिरोज पप्पू की गला रेतकर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। इस हाई-प्रोफाइल मर्डर ने पूरे इलाके के सियासी गलियारे को हिलाकर रख दिया।
पुलिस ने जब तफ्तीश की सुई घुमाई, तो इसके पीछे 'राजनीतिक दुश्मनी' का एंगल सामने आया। पुलिस का दावा था कि इस पूरी हत्या की स्क्रिप्ट जेल में बैठे पूर्व सांसद रिजवान जहीर, उनकी बेटी जेबा रिजवान और दामाद रमीज नेमत ने मिलकर लिखी थी। पुलिस ने तीन शूटरों समेत पूर्व सांसद और उनके परिजनों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया।
हत्या के मुकदमे के बाद, साल 2024 में बलरामपुर पुलिस ने एक नया दांव चला। तुलसीपुर थाने में रिजवान जहीर और रमीज नेमत के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। पुलिस ने जो गैंग चार्ट तैयार किया, उसमें एक दिलचस्प और हैरान करने वाली थ्योरी पेश की गई—
इस सख्त कानून को लागू करने के लिए पुलिस ने दो पुराने आपराधिक मुकदमों को ढाल बनाया था।
जब यह मामला हाईकोर्ट की दहलीज पर पहुंचा, तो माननीय न्यायाधीशों ने पुलिस की इस कहानी को सिरे से खारिज करते हुए कानून का पाठ पढ़ा दिया। कोर्ट ने जो कहा, वह हर उस पुलिस अधिकारी के लिए सबक है जो बिना पुख्ता तैयारी के गैंगस्टर एक्ट जैसे कड़े कानूनों का इस्तेमाल करते हैं:
"गैंगस्टर एक्ट जैसा कड़ा कानून बेहद संवेदनशील है। इसे बहुत सोच-समझकर और तय नियमों के दायरे में ही लगाया जाना चाहिए। सिर्फ इसलिए कि किसी व्यक्ति पर कुछ आपराधिक मामले दर्ज हैं, आप उस पर सीधे गैंगस्टर एक्ट नहीं थोप सकते।"
अदालत ने साफ किया कि इस सख्त कानून को लागू करने के लिए जिन विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों की आवश्यकता होती है, पुलिस उन्हें साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही।
हाईकोर्ट के इस तल्ख रुख से रिजवान जहीर के परिवार को कानूनी तौर पर एक बड़ी राहत मिलती दिख रही है। लेकिन इसके साथ ही 'बेबाक 24' यह सवाल भी उठाता है कि आखिर उत्तर प्रदेश पुलिस बिना ठोस कानूनी आधार और बिना पुख्ता सबूतों के ऐसे हाई-प्रोफाइल मामलों में इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाती है? क्या यह सिर्फ प्रशासनिक दबाव का नतीजा है, या फिर जांच एजेंसियों की लापरवाही, जिससे अंततः कोर्ट में पुलिस की किरकिरी होती है?
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