by on | 2026-05-27 22:37:57
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नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए कहा कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) मतदाता सूची तैयार करने और उसके विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR - Special Intensive Revision) के दौरान किसी व्यक्ति की नागरिकता की स्थिति की सीमित जांच कर सकता है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया कि आयोग किसी की नागरिकता पर अंतिम फैसला नहीं सुना सकता। किसी भी व्यक्ति को कानूनी रूप से भारत का नागरिक मानने या न मानने का अंतिम अधिकार केवल केंद्र सरकार के संबंधित सक्षम प्राधिकारियों के पास ही सुरक्षित है।
चुनाव आयोग की जांच का दायरा सिर्फ मतदाता सूची तक
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने चुनाव आयोग को मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का अधिकार देने वाले फैसले में यह अहम टिप्पणियां कीं:
- कानूनी आवश्यकता: पीठ ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 16 के तहत कानूनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आयोग नागरिकता से जुड़े सवालों की जांच कर सकता है।
- सीमित उद्देश्य: यह जांच केवल इसी सीमित उद्देश्य के लिए हो सकती है कि किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में शामिल करने योग्य है या नहीं, या पहले से दर्ज नाम को हटाया जाना चाहिए या नहीं।
- न्यायिक समीक्षा: अदालत ने साफ किया कि चुनाव आयोग द्वारा की गई यह पूरी प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के दायरे में रहेगी, ताकि जांच की निष्पक्षता और कानून का पालन सुनिश्चित किया जा सके।
नाम हटने से नागरिकता खत्म नहीं होती – सुप्रीम कोर्ट
अदालत ने उन आशंकाओं को पूरी तरह खारिज कर दिया जिनमें वोटर लिस्ट से नाम कटने को नागरिकता जाने से जोड़कर देखा जा रहा था:
- कानूनी धारणा: कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची में नाम होना नागरिकता की एक कानूनी धारणा को मजबूत करता है। लेकिन अगर उचित जांच के बाद किसी का नाम सूची से हटा भी दिया जाता है, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वह कानूनी रूप से गैर-नागरिक घोषित हो गया है।
- 4 हफ्ते की सख्त डेडलाइन: आम नागरिकों को उनके मताधिकार से अनुचित रूप से वंचित होने से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को एक बड़ा निर्देश दिया है। आयोग को नागरिकता के आधार पर वोटर लिस्ट से हटाए गए सभी मामलों को चार हफ्ते के भीतर नागरिकता कानून के तहत गठित सक्षम प्राधिकारी के पास भेजना होगा, ताकि अंतिम फैसला लिया जा सके।
चुनावी निष्पक्षता और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन
विशेषज्ञों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने के लिहाज से बेहद शानदार है। एक तरफ कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह प्रशासनिक शक्ति दी है कि वह वोटर लिस्ट की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) कर सके, जिससे फर्जी मतदाताओं को बाहर किया जा सके। वहीं दूसरी तरफ, नागरिकता तय करने का अंतिम अधिकार केंद्र सरकार के पास ही सीमित रखकर आम जनता को बड़ी राहत दी है। इससे यह साफ हो गया है कि किसी तकनीकी या प्रशासनिक चूक के कारण वोटर लिस्ट से नाम कटने पर भी किसी की भारतीय नागरिकता पर आंच नहीं आएगी।
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