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वर्दी शर्मसार, सिस्टम लाचार! जब रक्षक ही बन जाएं भक्षक, तो कैसे सुरक्षित रहेगा अब्दुल हमीद पुल?

by on | 2026-05-22 18:22:33

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वर्दी शर्मसार, सिस्टम लाचार! जब रक्षक ही बन जाएं भक्षक, तो कैसे सुरक्षित रहेगा अब्दुल हमीद पुल?


गाजीपुर (जमानियां): कहने को तो पुलिस का काम कानून की रक्षा करना और जनता को सुरक्षा देना है, लेकिन गाजीपुर के सुहवल से जो वीडियो सामने आया है, उसने खाकी की साख पर ऐसा बट्टा लगाया है जिसे धोना आसान नहीं होगा। कालूपुर चट्टी के पास देर रात जो हाई-वोल्टेज ड्रामा हुआ, उसने यह साफ कर दिया है कि जब बात 'अवैध कमाई' और 'बालू के खेल' की आती है, तो पुलिस के नियम-कानून कागजों तक ही सिमट कर रह जाते हैं।

​ जब सरेआम खुली पुलिसिया 'सेटिंग' की पोल: "कितना पैसा लिए हो?"

​वायरल वीडियो में एक कथित नेताजी ऑन-ड्यूटी सिपाही का हाथ पकड़कर उसे सरेआम हड़का रहे हैं, गाली-गलौज कर रहे हैं और नौकरी खाने की धमकी दे रहे हैं। लेकिन इस पूरे विवाद का जो सबसे घिनौना और हैरान करने वाला पहलू है, वो है सिपाही की लाचारी। सिपाही बार-बार हाथ छोड़ने की भीख मांग रहा है— "भैया हाथ छोड़ दीजिए..."

​अब सवाल यह उठता है कि जो पुलिस आम जनता पर लाठियां भांजने में एक मिनट नहीं लगाती, वह एक कथित नेता के सामने इतनी बेबस और लाचार क्यों खड़ी थी? नेताजी चीख-चीख कर कह रहे हैं—

"जा जा तुम भी जाओ… ले जाओ सब गाड़ी, तुम भी लेकर जाओ… कितना पैसा लिए हो?"

​नेताजी का यह गुस्सा और सिपाही की यह चुप्पी साफ गवाही दे रही है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है! यह गुस्सा किसी नियम को तोड़ने पर नहीं, बल्कि 'अवैध वसूली' के बंदरबांट या 'गाड़ी पास कराने' की सेटिंग बिगड़ने का नतीजा नजर आता है।

​ अब्दुल हमीद सेतु: जनता की जान दांव पर, पुलिस की जेबें गर्म!

​वीर अब्दुल हमीद सेतु की हालत किसी से छुपी नहीं है। तकनीकी खराबी के चलते प्रशासन ने खुद इस पुल पर भारी और बालू लदे ट्रकों के जाने पर सख्त पाबंदी (बैन) लगा रखी है।

​लेकिन हकीकत क्या है?

​रात ढलते ही इस पुल पर 'खाकी' की शह पर मौत का खेल शुरू हो जाता है।


​वीडियो में साफ दिख रहा है कि प्रतिबंधित लोडेड गाड़ियां धड़ल्ले से लाइन लगाकर गुजर रही हैं।


​स्थानीय लोगों का आरोप है कि सुहवल पुलिस की मिलीभगत और 'सुविधा शुल्क' के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, तो फिर ये विशालकाय ट्रक किसकी मर्जी से पुल की तरफ बढ़ रहे थे?


​यह सीधे तौर पर जनता की जान के साथ खिलवाड़ है। अगर भारी वाहनों के दबाव से पुल को कुछ होता है, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? क्या वो पुलिसकर्मी नहीं, जो चंद रुपयों की खातिर इन गाड़ियों को हरी झंडी दिखाते हैं?

​ बेबाक सवाल: पुलिसिया मिलीभगत पर कप्तान साहब कब खोलेंगे आंखें?

​ थानाध्यक्ष कमलेश कुमार का यह कह देना कि "गाड़ियां पास कराने का आरोप बेबुनियाद है", जनता के गले नहीं उतर रहा है। वीडियो में दिख रही गाड़ियां कोई भूतिया गाड़ियां नहीं थीं कि जो अचानक गायब हो जाएं।

' बेबाक 24' पुलिस प्रशासन के दावों पर सीधे सवाल पूछता है:

सवाल नंबर 1: अगर पुलिस दूध की धुली है, तो प्रतिबंधित रूट पर देर रात बालू लदे ट्रकों की कतारें क्या कर रही थीं? क्या सिपाही वहां ट्रकों की आरती उतारने के लिए खड़ा था?


सवाल नंबर 2: सिपाही का हाथ पकड़कर खींचा गया, उसे गालियां दी गईं, लेकिन पुलिस ने तुरंत उस दबंग नेता को गिरफ्तार क्यों नहीं किया? क्या पुलिस अपनी ही पोल खुलने के डर से बैकफुट पर आ गई थी?


सवाल नंबर 3: थानों से लेकर आला अधिकारियों के दफ्तरों तक लगे सीसीटीवी (CCTV) और हाई-टेक मॉनिटरिंग सिस्टम आखिर इस 'अवैध पासिंग' को क्यों नहीं देख पाते? क्या इन कैमरों पर भी 'रिश्वत की पट्टी' बंधी हुई है?


​ बेबाक राय (Conclusion)

​यह मामला सिर्फ एक नेता की बदतमीजी का नहीं है, बल्कि यह गाजीपुर पुलिस के उस भ्रष्ट तंत्र का पर्दाफाश है जो पैसों के लिए किसी भी नियम को ताक पर रख सकता है। पुलिस का काम दबंगों के आगे गिड़गिड़ाना और ट्रकों से वसूली करना नहीं, बल्कि कानून का इकबाल बुलंद करना है।

​अब देखना यह होगा कि गाजीपुर के एसपी (SP) इस वीडियो को देखने के बाद क्या एक्शन लेते हैं। क्या सिर्फ अभद्रता करने वाले नेता पर केस दर्ज कर मामले को रफा-दफा कर दिया जाएगा, या फिर अब्दुल हमीद पुल को 'अवैध कमाई का अड्डा' बनाने वाले भ्रष्ट पुलिसकर्मियों की वर्दी भी उतारी जाएगी?



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