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मणिकर्णिका घाट पुनर्विकास: विरासत पर 'चोट' से आक्रोश, पाल समाज ने घेरा कार्यस्थल

by on | 2026-01-13 21:28:35

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मणिकर्णिका घाट पुनर्विकास: विरासत पर 'चोट' से आक्रोश, पाल समाज ने घेरा कार्यस्थल

वाराणसी। काशी के मोक्षदायिनी मणिकर्णिका घाट पर चल रहे पुनर्विकास कार्य ने अब एक बड़े विवाद का रूप ले लिया है। घाट पर सौंदर्यीकरण और निर्माण के दौरान करीब 300 साल पुरानी मणि और उसमें स्थापित प्राचीन मूर्तियों के क्षतिग्रस्त होने के आरोप लगे हैं। इस घटना के बाद पाल समाज के लोगों ने मौके पर पहुंचकर जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया और धरोहरों की पुनः स्थापना की मांग की।
मशीनों के वार से मलबे में तब्दील हुई विरासत!
​जानकारी के अनुसार, घाट पर कार्यदायी संस्था द्वारा हाइड्रा मशीनों के जरिए पक्के घाट के भारी पत्थरों को हटाया जा रहा है। इन पत्थरों को नाव के जरिए गंगा पार भेजा जा रहा है। इसी बीच, एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ जिसमें ऐतिहासिक मणि के क्षतिग्रस्त होने का दावा किया गया।
​स्थानीय निवासी संजय मिश्रा ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, "जिस मणि की देखरेख हमारा परिवार पीढ़ियों से कर रहा था, उसे बिना किसी सूचना के ध्वस्त कर दिया गया। इसके भीतर लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की मूर्ति और एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित था, जिसे कार्य के दौरान तोड़ दिया गया।"
​वहीं, पाल समाज के प्रतिनिधि मयंक पाल ने चेतावनी दी कि यदि इन मूर्तियों और ऐतिहासिक मणि को ससम्मान पुनः स्थापित नहीं किया गया, तो समाज बड़ा आंदोलन करने को बाध्य होगा। उन्होंने पुलिस पर लोगों को बलपूर्वक हटाने का भी आरोप लगाया।
​प्रशासनिक अमला मौके पर, जांच के निर्देश
​विवाद की गंभीरता को देखते हुए डीसीपी, एसीपी और एडीएम सिटी भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने आक्रोशित लोगों को समझा-बुझाकर शांत कराया।
​एडीएम सिटी का पक्ष: "फिलहाल किसी मंदिर को तोड़ने की पुष्टि नहीं हुई है। मणि के भीतर मूर्ति होने की बात संज्ञान में आई है, जिसकी बारीकी से जांच कराई जा रही है। बाहरी लोगों को हटाकर स्थिति को नियंत्रण में कर लिया गया है।"
​विकास और विरासत का संतुलन बना चुनौती
​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल मणिकर्णिका पुनर्विकास योजना अब 'आस्था बनाम आधुनिकता' की बहस में उलझ गई है।
​प्रोजेक्ट की मुख्य बातें:
​लागत: 18 करोड़ रुपये (सीएसआर फंड से)।
​क्षेत्रफल: 29,350 वर्ग मीटर का कायाकल्प।
​आधुनिक सुविधाएं: 25 मीटर ऊंची चिमनी, 18 खुले और 5 ढके हुए दाह संस्कार प्लेटफॉर्म।
​विशेष निर्माण: जी+1 मॉडल पर बाढ़ प्रतिरोधी तकनीक और चुनार-जयपुर के पत्थरों का उपयोग।

​bebak24 विशेष: काशी में विकास की गति के बीच प्राचीन प्रतीकों का अस्तित्व बचाना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। जहां एक ओर श्रद्धालु अत्याधुनिक सुविधाओं की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्राचीन मणियों और मूर्तियों के नुकसान ने स्थानीय जनता और पाल समाज की भावनाओं को आहत किया है।



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