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अन्नदाता—प्रकृति की मार और व्यवस्था की हार

by admin@bebak24.com on | 2025-12-24 11:16:56

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अन्नदाता—प्रकृति की मार और व्यवस्था की हार

सन्तोष राय

भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले किसान आज पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के खेतों में अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। विडंबना यह है कि जिस समय किसान को अपनी मेहनत का फल घर ले जाना चाहिए था, उस समय वह कुदरत के प्रकोप और भ्रष्ट तंत्र के दोहरे चक्रव्यूह में फंसा हुआ है।

खेतों में सड़ता सोना और बेबस किसान

​बेमौसम बारिश ने न केवल फसलों को जमीन पर सुला दिया, बल्कि खेतों को कीचड़ में तब्दील कर दिया है। भारी कंबाइन हार्वेस्टर मशीनों का खेतों में न उतर पाना एक तकनीकी समस्या से कहीं अधिक किसान की आर्थिक कमर तोड़ने वाली बात है। जो धान बच गया है, उसे 'मिलर्स' नमी और गुणवत्ता के नाम पर भारी कटौती कर औने-पौने दामों पर खरीद रहे हैं। यह खुलेआम लूट है, जिसे रोकने में स्थानीय प्रशासन पूरी तरह विफल नजर आ रहा है।

डीएपी का संकट: सरकारी दावे बनाम जमीनी हकीकत

​धान की मार से उबरने की कोशिश कर रहे किसान के सामने अब रबी की फसल (गेहूं) की बुवाई की चुनौती है। सरकारी आंकड़ों में डीएपी (DAP) की कोई कमी नहीं है, लेकिन खाद की दुकानों के बाहर लगी लंबी कतारें और 'ब्लैक मार्केटिंग' कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं।

बड़ा सवाल: जब खाद की रैक आती है, तो वह सरकारी गोदामों के बजाय बिचौलियों के पास कैसे पहुँच जाती है? कृषि अधिकारियों की नाक के नीचे चल रहा यह खेल बिना राजनीतिक संरक्षण के संभव नहीं है। 'फर्टिलाइजर माफिया' का यह नेटवर्क सीधे तौर पर सरकार की साख पर बट्टा लगा रहा है।


लागत भी नहीं निकाल पा रहे आलू-प्याज के किसान

​सब्जी उत्पादकों की स्थिति और भी दयनीय है। बाजार में आलू और प्याज के गिरते दामों ने किसानों को इस कदर मजबूर कर दिया है कि उन्हें अपनी लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। कोल्ड स्टोरेज का किराया और परिवहन का खर्च फसल की कीमत से ज्यादा बैठ रहा है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की बहस के बीच, सब्जी उत्पादक किसान हमेशा की तरह बाजार के रहमोकरम पर छोड़ दिए गए हैं।

निष्कर्ष: केवल दावों से पेट नहीं भरता

​सरकार और कृषि विभाग के बड़े-बड़े दावे धरातल पर दम तोड़ रहे हैं। कृषि अधिकारियों की उदासीनता और कालाबाजारी करने वालों पर नकेल न कस पाना सरकार की प्रशासनिक विफलता का प्रमाण है। यदि समय रहते खाद की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की गई और धान की खरीद में मिलर्स की मनमानी नहीं रोकी गई, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था का ढांचा चरमरा जाएगा।

​सरकार को समझना होगा कि किसान को सहानुभूति नहीं, बल्कि उसकी फसल का सही दाम और समय पर खाद-बीज चाहिए। व्यवस्था को ठेंगा दिखाने वाले अधिकारियों और माफियाओं पर जब तक कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक 'समृद्ध किसान' का सपना केवल कागजों तक ही सीमित रहेगा।



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