by admin@bebak24.com on | 2026-03-06 21:31:20
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भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर अमेरिका द्वारा दी गई 'अस्थायी राहत' ने देश के सियासी गलियारे में एक नया तूफान खड़ा कर दिया है। शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत सहित विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं ने मोदी सरकार को आड़े हाथों लिया है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि भारत की ऊर्जा नीति अब वाशिंगटन के निर्देशों पर चल रही है, जो देश की संप्रभुता के लिए एक बड़ा खतरा है।
क्या है पूरा मामला?
अमेरिकी वित्त विभाग (US Treasury) ने हाल ही में भारतीय रिफाइनरों को रूसी कच्चे तेल की खरीद के लिए 30 दिनों की विशेष छूट (Waiver) देने का ऐलान किया है। यह छूट तकनीकी रूप से केवल उन खेपों के लिए है जो ५ मार्च २०२६ तक जहाजों पर लोड हो चुकी थीं। वाशिंगटन का तर्क है कि यह कदम वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बनाए रखने के लिए उठाया गया है, क्योंकि मध्य-पूर्व, विशेषकर ईरान में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में भारी उछाल आने का खतरा मंडरा रहा है।
संजय राउत का तीखा प्रहार: 'कूटनीतिक आत्मसमर्पण'
राज्यसभा सांसद और शिवसेना (UBT) के मुख्य प्रवक्ता संजय राउत ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरते हुए इसे सरकार की कमजोरी बताया है। उन्होंने कहा कि यह कोई "मास्टरस्ट्रोक" नहीं बल्कि "कूटनीतिक आत्मसमर्पण" है।
राउत ने कड़े शब्दों में कहा, "क्या अब भारत को अपनी जरूरत का तेल खरीदने के लिए भी अमेरिका से 'लाइसेंस' लेना पड़ेगा? सरकार बड़े-बड़े दावे करती है कि हम किसी के दबाव में नहीं आते, लेकिन हकीकत यह है कि अमेरिका हमें बता रहा है कि हमें कब और कितना तेल खरीदना है। यह हमारी विदेश नीति की स्पष्ट विफलता है।"
विपक्षी खेमे में भारी आक्रोश
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर सरकार की घेराबंदी तेज कर दी है:
जयराम रमेश (कांग्रेस): उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार पर तंज कसते हुए इसे "अमेरिकी ब्लैकमेल" करार दिया। रमेश ने सवाल उठाया कि क्या केंद्र सरकार ने पर्दे के पीछे चुपचाप अमेरिकी शर्तों को स्वीकार कर लिया है?
मनीष तिवारी (कांग्रेस): पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने छूट की शब्दावली पर आपत्ति जताते हुए पूछा कि क्या भारत जैसी उभरती शक्ति अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए अब अमेरिकी अनुमति की मोहताज हो गई है?
रणदीप सुरजेवाला: कांग्रेस नेता सुरजेवाला ने आरोप लगाया कि इस संवेदनशील मुद्दे पर सरकार की चुप्पी यह दर्शाती है कि भारत की संप्रभुता के साथ समझौता किया जा रहा है।
सरकार का बचाव और वैश्विक बाजार के समीकरण
विपक्षी हमलों के बीच सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह एक रणनीतिक और व्यावहारिक कदम है। सरकार का तर्क है कि ईरान-इजरायल तनाव के चलते 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' (जो तेल व्यापार का प्रमुख रास्ता है) से होने वाली आपूर्ति बाधित होने की प्रबल आशंका है। ऐसी स्थिति में, रूस से आने वाला तेल भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए एक 'लाइफलाइन' की तरह काम करेगा।
मुख्य बिंदु जो विवाद की जड़ हैं:
वैधता: अमेरिकी छूट केवल ३ अप्रैल २०२६ तक प्रभावी रहेगी।
कड़ी शर्त: यह केवल उन्हीं कार्गो पर लागू होगी जो ५ मार्च २०२६ से पहले लोड हो चुके थे।
रणनीतिक कारण: अमेरिका का मुख्य उद्देश्य ईरान संकट के बीच वैश्विक तेल किल्लत को रोकना है।
विपक्ष के इन हमलावर तेवरों ने मोदी सरकार को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में संसद में 'सॉवरेनिटी' (संप्रभुता) के इस मुद्दे पर गरमागरम बहस देखने को मिल सकती है।
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