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पूर्वांचल का सुलगता सियासी रण: दुश्मन, दोस्ती और मोहम्मदाबाद का सवाल!

by on | 2026-10-21 23:58:23

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पूर्वांचल का सुलगता सियासी रण: दुश्मन, दोस्ती और मोहम्मदाबाद का सवाल!


​"दुश्मन, दुश्मन ही रहेंगे... चाहे भले पार्टी अपना ले, वह अभय सिंह हों या कोई और। गाजीपुर में भी एक-दो हैं, लेकिन दुश्मनी से कोई गुरेज नहीं। मेरे पिता अपराधियों के संरक्षक नहीं थे।"

​यह दो टूक और बेबाक बयान किसी आम राजनीतिक सभा का नहीं, बल्कि एक हालिया पॉडकास्ट में पीयूष राय द्वारा दिए गए तीखे शब्दों का है। पीयूष राय—जो पूर्वांचल की राजनीति के ध्रुव तारे रहे भाजपा के दिवंगत विधायक कृष्णानंद राय के सुपुत्र हैं—उन्होंने इस बातचीत के दौरान साफ कर दिया कि विचारधारा और राजनीतिक समीकरण चाहे जो बदल जाएं, पुरानी अदावतें और उसूल आसानी से नहीं बदलते।

​बीजेपी की दोहरी नीति पर उठ रहे बड़े सवाल

​पीयूष राय के इस तेवर के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं कि आखिर भारतीय जनता पार्टी (BJP) अपनों के ही मामलों में ऐसा रुख क्यों अपना रही है? सवाल उठने लाजिमी हैं क्योंकि पूर्वांचल के सियासी समीकरण कुछ ऐसा इशारा कर रहे हैं:

​सुरक्षा पर भेदभाव: जहां एक तरफ मुख्तार अंसारी के करीबी रहे बीजेपी एमएलसी विशाल सिंह चंचल, डॉन व पूर्व एमएलसी बृजेश सिंह, विधायक सुशील सिंह और अभय सिंह जैसे नेताओं को Y-श्रेणी या भारी-भरकम सुरक्षा मुहैया कराई गई है, वहीं कृष्णानंद राय के बेटे पीयूष राय को केवल एक सामान्य गनर पर ही संतोष करना पड़ रहा है।


​खुद की सुरक्षा पर पीयूष का रुख: जब उनसे खतरे और सुरक्षा को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने बहुत बेबाकी से जवाब दिया— "यह मेरा मामला है, डरने वाले कहानी बनाते फिरते हैं, मैं डरता नहीं!"


​क्या मोहम्मदाबाद में दोहराएगा 'मोकामा' जैसा इतिहास?

​पूर्वांचल की सरज़मीन पर आज भी राजनीतिक रंजिश और वर्चस्व की आग ठंडी नहीं पड़ी है। मोहम्मदाबाद की फिज़ाओं में आज भी उस पुरानी अदावत की गूंज सुनाई देती है, जिसने कई घर उजाड़े हैं।

​प्रतिशोध की ज्वाला: भले ही वक्त बदल गया हो, लेकिन मोहम्मदाबाद से लेकर पूरे पूर्वांचल तक आज भी प्रतिशोध की वह चिंगारी अंदर-ही-अंदर सुलग रही है।


​मोकामा जैसी सुगबुगाहट: कमोवेश मोहम्मदाबाद में भी मोकामा जैसी स्थिति बनती दिखाई दे रही है। वहां जैसे अनंत सिंह को घेरने के लिए बाहरी और अपने दल के भी लोग लगे थे, वहीं पीयूष राय को भी घेरने के लिए चूहा-बिल्ली एक ही डाल पर बैठे नजर आ रहे हैं। देखना यह होगा कि क्या वे इस जननेता को घेर पाते हैं या फिर समय आने पर उन्हें भी किसी और की तरह सियासी मजबूरी का सामना करना पड़ेगा।


​गहराता मोहम्मदाबाद का गढ़ और जननेता की छवि

​बढ़ता जनसमर्थन: एक जननेता की छवि में तेजी से उभर रहे पीयूष राय के तेवरों के आगे कई तथाकथित दिग्गजों और माफियाओं की सांसें फूलती नजर आती हैं।


​जनता का साथ: मोहम्मदाबाद ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वांचल में एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो पीयूष राय को अपने नायक के रूप में देखता है और उनके समर्थन में चट्टान की तरह खड़ा है। ऐसे में समर्थकों की चिंताएं और सुरक्षा को लेकर पार्टी का ढुलमुल रवैया किसी बड़े खतरे का संकेत तो नहीं दे रहा?


​सबसे बड़ा सवाल

​सवाल यह है कि आखिर पूर्वांचल के इस खूनी और सियासत से सराबोर इतिहास का अंत कहां होगा? कहां रुकेगी मोहम्मदाबाद की यह पुरानी अदावत? क्या प्रशासन और पार्टी नेतृत्व समय रहते इस सुलगती चिंगारी को भांप पाएगा, या फिर इतिहास खुद को दोहराने पर मजबूर होगा?



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