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बृजभूषण शरण सिंह बरी, लेकिन फैसला सार्वजनिक क्यों नहीं? कोर्ट के आदेश पर उठे सवाल

by admin@bebak24.com on | 2026-08-15 13:13:36

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बृजभूषण शरण सिंह बरी, लेकिन फैसला सार्वजनिक क्यों नहीं? कोर्ट के आदेश पर उठे सवाल

नई दिल्ली: भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष और भाजपा नेता बृजभूषण शरण सिंह को महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न से जुड़े मामले में दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत ने 3 अगस्त 2026 को बरी कर दिया। हालांकि, फैसला सुनाए जाने के कई दिन बाद तक 244 पन्नों का पूरा निर्णय अदालत की वेबसाइट पर सार्वजनिक नहीं किया गया, जिससे न्यायिक पारदर्शिता और फैसले तक सार्वजनिक पहुंच को लेकर सवाल उठे हैं।

फैसले की प्रतियां 10 अगस्त को दोनों पक्षों के वकीलों को उपलब्ध कराए जाने की जानकारी सामने आई है। वहीं, वकीलों से कथित तौर पर ऐसा उपक्रम भी लिया गया कि वे आदेश की प्रति संबंधित पक्षों के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को उपलब्ध नहीं कराएंगे।

फैसले को सार्वजनिक न किए जाने पर सवाल क्यों?

अदालत के फैसले आम तौर पर सार्वजनिक न्यायिक अभिलेख का हिस्सा होते हैं। हालांकि, यौन उत्पीड़न जैसे मामलों में पीड़ित की पहचान और संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक हिस्सों का संपादन या गोपनीयता संबंधी निर्देश दिए जा सकते हैं।

इसी अंतर को लेकर कानूनी विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि पीड़ितों की पहचान सुरक्षित रखना और पूरे फैसले को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न कराना एक ही बात नहीं है

विधि क्षेत्र के विशेषज्ञों के अनुसार, न्यायिक कार्यवाही की रिपोर्टिंग और जनता का अदालतों के फैसलों तक पहुंचना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा खुली न्याय व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। हालिया न्यायिक फैसलों में भी सार्वजनिक न्यायिक अभिलेखों और खुली न्याय व्यवस्था के महत्व पर जोर दिया गया है।

क्या कोर्ट फैसले को सार्वजनिक करने से रोक सकती है?

कानून में पीड़ित की पहचान और निजी विवरणों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट प्रतिबंध हो सकते हैं। ऐसे मामलों में अदालत जरूरत के मुताबिक नाम, पता और अन्य पहचान संबंधी जानकारी को हटाकर आदेश उपलब्ध करा सकती है।

लेकिन विशेषज्ञों का सवाल यह है कि यदि फैसला सुनाया जा चुका है, तो उसकी पूरी प्रति को सामान्य सार्वजनिक पहुंच से रोकने का आधार क्या है और यह रोक कितने समय तक रहेगी।

इस मामले में फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि वकीलों से लिए गए उपक्रम में किस कानूनी प्रावधान के तहत आदेश साझा करने पर रोक लगाई गई है और यह रोक कब तक लागू रहेगी।

कोर्ट ने बृजभूषण को किन आरोपों से बरी किया?

बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 354, 354ए, 354डी और 506 के तहत आरोप थे। ये धाराएं महिला की गरिमा भंग करने, यौन उत्पीड़न, पीछा करने और आपराधिक धमकी से संबंधित थीं।

मामले में भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व महासचिव विनोद तोमर भी आरोपी थे। अदालत ने उन्हें भी धमकी से जुड़े आरोप से बरी किया।

यह मामला वर्ष 2023 में महिला पहलवानों के आरोपों के बाद राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था। इसके बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर लंबे समय तक प्रदर्शन हुए थे।

अदालत ने फैसले में क्या कहा?

मीडिया संस्थानों द्वारा देखी गई फैसले की प्रति के अनुसार, अदालत ने अभियोजन के मामले पर गंभीर सवाल उठाए और आरोपों को मनगढ़ंत तथा काल्पनिक तरीके से तैयार किए जाने की बात कही।

अदालत ने कुछ शिकायतकर्ताओं के बयानों में विरोधाभास और घटनाओं से जुड़ी तारीखों तथा स्थानों के विवरण में अंतर को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत के मुताबिक, कुछ गवाह अपने पहले के बयानों से मुकर गए और इससे अभियोजन के मामले की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।

बृजभूषण के वकील राजीव मोहन ने अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष के बयानों में मौजूद विरोधाभासों को बचाव पक्ष ने अदालत के सामने रखा और अदालत ने उन पर विचार किया।

अभियोजन पक्ष ने फैसले पर क्या आपत्ति जताई?

अभियोजन पक्ष की वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने फैसले को लेकर गंभीर असहमति जताई है। उनका कहना है कि अदालत ने पीड़ितों और गवाहों की विस्तृत गवाही को पर्याप्त महत्व नहीं दिया और बिना ठोस आधार के उन्हें साजिश का हिस्सा मानने का निष्कर्ष निकाला।

उन्होंने यह भी कहा कि कुछ तारीखों या विवरणों में मामूली विरोधाभासों के आधार पर पूरे मामले को खारिज करना उचित नहीं था।

यानी अदालत और अभियोजन पक्ष ने उपलब्ध साक्ष्यों की विश्वसनीयता का अलग-अलग मूल्यांकन किया है।

दो गवाहों के मुकरने का मुद्दा भी महत्वपूर्ण

मामले में शिकायत करने वाली 6 महिला पहलवानों में से 2 के बयानों को लेकर अदालत ने विशेष रूप से विचार किया। इन दोनों ने अपने पहले के बयानों से अलग रुख अपनाया था।

रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने अदालत के सामने अपने पहले के बयानों के पीछे राजनीतिक दबाव होने की बात कही। अदालत ने इन बदलावों को अभियोजन के मामले के लिए महत्वपूर्ण माना।

इसके विपरीत अभियोजन पक्ष का तर्क रहा कि गवाहों के बयान में अंतर या मुकदमे के दौरान रुख बदलना अपने आप में मूल शिकायत को झूठा साबित नहीं करता।

अब महिला पहलवान क्या करेंगी?

बृजभूषण शरण सिंह के बरी होने के बाद महिला पहलवानों की ओर से फैसले के खिलाफ अपील किए जाने की बात कही गई है। विनेश फोगाट और अन्य पहलवानों ने फैसले पर निराशा व्यक्त करते हुए कानूनी लड़ाई जारी रखने का संकेत दिया है।

इसका मतलब है कि ट्रायल कोर्ट का फैसला मामले का अंतिम न्यायिक पड़ाव जरूरी नहीं है। उच्च अदालत में अपील के दौरान निचली अदालत के साक्ष्यों और निष्कर्षों की दोबारा समीक्षा हो सकती है।

फैसला सार्वजनिक न होना क्यों महत्वपूर्ण है?

इस मामले में सबसे बड़ा सवाल केवल बरी किए जाने का नहीं, बल्कि फैसले तक सार्वजनिक पहुंच का भी है।

एक तरफ यौन उत्पीड़न मामले में पीड़ितों की निजता की रक्षा जरूरी है। दूसरी तरफ अदालत का फैसला यह बताता है कि न्यायालय ने किस साक्ष्य को स्वीकार किया, किसे अस्वीकार किया और किस कानूनी आधार पर निष्कर्ष तक पहुंचा।

इसीलिए कानूनी विशेषज्ञों की नजर इस बात पर है कि अदालत का पूरा आदेश कब सार्वजनिक होगा और क्या आवश्यक गोपनीय जानकारी हटाने के बाद उसे आम लोगों और मीडिया के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।

मामला अब किस दिशा में जाएगा?

बृजभूषण शरण सिंह को ट्रायल कोर्ट से राहत मिल चुकी है, लेकिन फैसले के खिलाफ संभावित अपील से मामला आगे बढ़ सकता है। वहीं, फैसले को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने को लेकर उठे सवाल न्यायिक पारदर्शिता और पीड़ितों की निजता के बीच संतुलन की बहस को भी सामने ला रहे हैं।

बेबाक24 टेक : इस मामले में फिलहाल 2 अलग सवाल महत्वपूर्ण हैं—पहला, क्या बृजभूषण शरण सिंह का बरी होना उच्च अदालत में भी कायम रहता है और दूसरा, संवेदनशील पहचान संबंधी जानकारी सुरक्षित रखते हुए अदालत का विस्तृत फैसला सार्वजनिक रूप से कब उपलब्ध कराया जाता है।



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