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लाल किले पर पहली बार ‘जन गण मन’ से पहले गूंजा ‘वंदे मातरम्’, बदले प्रोटोकॉल के क्या हैं मायने?

by admin@bebak24.com on | 2026-08-15 13:12:45

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लाल किले पर पहली बार ‘जन गण मन’ से पहले गूंजा ‘वंदे मातरम्’, बदले प्रोटोकॉल के क्या हैं मायने?

नई दिल्ली: भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर दिल्ली के लाल किले में आयोजित आधिकारिक समारोह में इस बार एक महत्वपूर्ण प्रोटोकॉल बदलाव देखने को मिला। पहली बार ‘जन गण मन’ से पहले ‘वंदे मातरम्’ का गायन किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किले पहुंचने के बाद सबसे पहले राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ बजाया गया। इसके बाद राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया और उस दौरान राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ बजाया गया।

यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब केंद्र सरकार ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर हाल में कानूनी प्रावधानों में बदलाव किए हैं और इसके 150वें वर्ष को विशेष रूप से मनाया जा रहा है।

क्या बदला है?

अब तक स्वतंत्रता दिवस जैसे प्रमुख राष्ट्रीय समारोहों में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ को सर्वोच्च आधिकारिक संगीतमय प्रतीक के रूप में प्रमुखता मिलती रही है। इस बार नए कार्यक्रम क्रम में ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान से पहले स्थान दिया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से अपने संबोधन में भी इस बदलाव का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद यह पहली बार है जब लाल किले पर ‘वंदे मातरम्’ को इस तरह विशेष स्थान मिला है।

‘वंदे मातरम्’ को लेकर नया कानूनी बदलाव

हाल ही में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम कानून, 1971 में संशोधन किया गया है। संशोधित प्रावधानों के तहत राष्ट्रीय गीत के अपमान के मामले में भी राष्ट्रगान के अपमान की तरह 3 साल तक की सजा का प्रावधान लागू किया गया है।

इस बदलाव को सरकार ने राष्ट्रीय गीत के सम्मान को मजबूत करने की दिशा में कदम के रूप में पेश किया है।

हालांकि, विपक्ष ने संसद में इस प्रावधान को लेकर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेता शशि थरूर ने विशेष रूप से आधिकारिक समारोहों में ‘वंदे मातरम्’ के पूरे संस्करण और उसे अनिवार्य किए जाने के व्यावहारिक पहलुओं पर आपत्ति जताई है।

राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत में क्या अंतर है?

‘जन गण मन’ को भारत का राष्ट्रगान माना जाता है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है।

रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित ‘जन गण मन’ और बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम्’ दोनों का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना में महत्वपूर्ण स्थान रहा है।

हालांकि, ‘वंदे मातरम्’ के बाद के पदों में धार्मिक और देवी-देवताओं से जुड़े संदर्भ होने के कारण लंबे समय से यह बहस भी रही है कि राष्ट्रीय समारोहों में इसके कितने पदों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

‘वंदे मातरम्’ का मूल लेखन 1875 में हुआ था और इसके बाद इसके अन्य पद बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किए गए।

वर्ष 1937 में कांग्रेस के भीतर भी इस बात पर चर्चा हुई थी कि राष्ट्रीय गीत के रूप में इसके किन पदों को अपनाया जाए। उस समय रवींद्रनाथ टैगोर ने मुस्लिम समुदाय और कुछ अन्य एकेश्वरवादी समूहों की धार्मिक संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए शुरुआती पदों को प्राथमिकता देने की सलाह दी थी।

इसी वजह से ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती पद और इसके पूर्ण संस्करण को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस समय-समय पर सामने आती रही है।

मुस्लिम संगठनों ने क्यों जताई आपत्ति?

कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण को लेकर आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि इसके कुछ पदों में देवी स्वरूप में मातृभूमि की वंदना के संदर्भ हैं, जो उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं हैं।

हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस बदलाव का विरोध करते हुए कहा है कि राष्ट्रगान में देश और उसके नागरिकों की बात प्रमुखता से आती है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ के कुछ पदों में धार्मिक प्रतीकों का संदर्भ मौजूद है।

विपक्ष ने क्या सवाल उठाए?

कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि ‘वंदे मातरम्’ को लेकर नया प्रोटोकॉल राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे से जुड़ा हुआ है।

कांग्रेस नेता शशि थरूर ने यह सवाल भी उठाया कि अगर किसी आधिकारिक समारोह में ‘वंदे मातरम्’, ‘जन गण मन’ और कुछ राज्यों के अपने गीत भी शामिल हों, तो कार्यक्रम का प्रारूप कितना लंबा होगा और क्या सम्मान जैसी भावनाओं को कानून के जरिए बाध्य किया जा सकता है।

डीएमके समेत कुछ दलों ने भी आरोप लगाया है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के जरिए किसी एक सांस्कृतिक दृष्टिकोण को थोपने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।

तमिलनाडु और केरल का अलग रुख

इस मुद्दे पर कुछ गैर-भाजपा शासित राज्यों ने अपनी अलग स्थिति स्पष्ट की है।

तमिलनाडु में मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने कहा है कि सरकारी और आधिकारिक कार्यक्रमों की शुरुआत राज्य के आधिकारिक गीत ‘तमिल थाई वाज़्थु’ से होगी।

वहीं, केरल सरकार ने स्पष्ट किया है कि राज्य के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के सभी पद नहीं गाए जाएंगे और पहले की परंपरा के अनुसार शुरुआती 2 पदों को ही प्राथमिकता दी जाएगी।

सरकार के लिए इसका राजनीतिक और सांस्कृतिक अर्थ

‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय चेतना से जोड़कर देखने की लंबी परंपरा रही है। केंद्र सरकार की ओर से इसके सम्मान और आधिकारिक उपयोग को बढ़ाने का फैसला इसी ऐतिहासिक भूमिका पर जोर देता है।

दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि भारत की बहुलतावादी पहचान को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत से जुड़े प्रोटोकॉल में सभी समुदायों की संवेदनाओं का ध्यान रखना जरूरी है।

इसलिए लाल किले पर ‘वंदे मातरम्’ को ‘जन गण मन’ से पहले स्थान देना केवल कार्यक्रम का बदलाव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों, इतिहास, धर्मनिरपेक्षता और सांस्कृतिक पहचान को लेकर चल रही व्यापक बहस का हिस्सा बन गया है।

बेबाक24 टेक : 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले का बदला हुआ संगीत प्रोटोकॉल आने वाले समय में भी चर्चा का विषय रहने वाला है। एक तरफ इसे राष्ट्रीय गीत के सम्मान और उसके ऐतिहासिक महत्व की पुनर्स्थापना के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसके धार्मिक संदर्भों और राष्ट्रीय समारोहों में अनिवार्यता को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।



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