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रिलायंस-रोल्स-रॉयस की बड़ी साझेदारी, एएमसीए के लिए बनेगा स्वदेशी लड़ाकू इंजन; क्या भारत अमेरिका से आगे बढ़ा रहा विकल्प?

by admin@bebak24.com on | 2026-08-15 13:07:29

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रिलायंस-रोल्स-रॉयस की बड़ी साझेदारी, एएमसीए के लिए बनेगा स्वदेशी लड़ाकू इंजन; क्या भारत अमेरिका से आगे बढ़ा रहा विकल्प?

नई दिल्ली: भारत के 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमान एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) कार्यक्रम को लेकर रिलायंस इंडस्ट्रीज और ब्रिटेन की रोल्स-रॉयस ने रणनीतिक साझेदारी का ऐलान किया है। दोनों कंपनियां भारत में एएमसीए के लिए स्वदेशी लड़ाकू विमान इंजन के डिजाइन, विकास, निर्माण और दीर्घकालीन आपूर्ति की क्षमता विकसित करने की योजना बना रही हैं।

कंपनियों के अनुसार, भारत में एक समर्पित एयरोस्पेस गैस टरबाइन परिसर स्थापित करने की संभावनाएं भी तलाश की जाएंगी। यह पहल भारत की महत्वपूर्ण रक्षा तकनीकों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखी जा रही है।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह घोषणा अपने आप में एएमसीए इंजन का अंतिम ठेका मिलने के बराबर नहीं है। भारत को अभी यह तय करना है कि कार्यक्रम के लिए किस विदेशी प्रौद्योगिकी साझेदार के साथ आगे बढ़ना है।

रिलायंस और रोल्स-रॉयस क्या करना चाहते हैं?

रिलायंस और रोल्स-रॉयस का प्रस्ताव भारत में एएमसीए के लिए लड़ाकू इंजन विकसित करने और उसका निर्माण करने का है।

रोल्स-रॉयस अपनी विमान इंजन और उन्नत प्रोपल्शन तकनीक की विशेषज्ञता लाएगी, जबकि रिलायंस अपनी औद्योगिक क्षमता, विनिर्माण और बड़े स्तर पर परियोजनाएं लागू करने की क्षमता का उपयोग करेगी। दोनों कंपनियां भारत में एयरोस्पेस गैस टरबाइन परिसर विकसित करने की संभावनाएं तलाशेंगी।

रिलायंस के कार्यकारी निदेशक अनंत अंबानी ने कहा है कि महत्वपूर्ण तकनीकों में भारत की स्वतंत्र क्षमता रणनीतिक स्वायत्तता के लिए जरूरी है।

एएमसीए के लिए इंजन इतना महत्वपूर्ण क्यों?

एएमसीए भारत के महत्वाकांक्षी 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमान कार्यक्रम का हिस्सा है। इसका उद्देश्य ऐसा स्वदेशी विमान विकसित करना है जो आधुनिक हवाई युद्ध की जरूरतों को पूरा कर सके।

लेकिन लड़ाकू विमान के विकास में इंजन सबसे कठिन तकनीकी क्षेत्रों में से एक माना जाता है। किसी अत्याधुनिक लड़ाकू इंजन के लिए उच्च तापमान सहने वाली सामग्री, टर्बाइन तकनीक, उन्नत दहन प्रणाली और उच्च थ्रस्ट जैसी क्षमताओं की जरूरत होती है।

यही वजह है कि भारत के लिए एएमसीए का इंजन केवल एक विमान का हिस्सा नहीं, बल्कि दीर्घकालीन रणनीतिक और औद्योगिक क्षमता का विषय है।

क्या भारत अमेरिका से दूरी बना रहा है?

रिलायंस-रोल्स-रॉयस साझेदारी को केवल अमेरिका से दूरी बनाने के रूप में देखना सही नहीं होगा।

भारत पिछले वर्षों में अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और अन्य देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाता रहा है। नई पहल का बड़ा उद्देश्य महत्वपूर्ण तकनीकों और आपूर्ति शृंखला में किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कम करना और भारत में उत्पादन क्षमता बढ़ाना है।

यानी रणनीति को ‘अमेरिका से दूरी’ की बजाय ‘कई विश्वसनीय साझेदारों के साथ विकल्प बढ़ाने’ के रूप में समझना अधिक उचित होगा।

एएमसीए के इंजन के लिए भारत के सामने अलग-अलग विदेशी कंपनियों के प्रस्ताव भी रहे हैं, जिससे नई साझेदारी प्रतियोगिता को और दिलचस्प बना सकती है।

रोल्स-रॉयस के सामने सफ्रान भी मैदान में

एएमसीए इंजन के क्षेत्र में ब्रिटेन की रोल्स-रॉयस अकेली संभावित साझेदार नहीं है। फ्रांस की सफ्रान भी भारत के साथ उच्च थ्रस्ट वाले लड़ाकू इंजन के विकास के लिए प्रस्ताव दे चुकी है।

रिलायंस और रोल्स-रॉयस की घोषणा ऐसे समय हुई है जब भारत उन्नत लड़ाकू इंजन के लिए विदेशी तकनीकी साझेदारी को अंतिम रूप देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

इससे भारत के सामने तकनीक, लागत, समयसीमा, स्वदेशीकरण और तकनीक हस्तांतरण के आधार पर अलग-अलग विकल्पों की तुलना करने की गुंजाइश बढ़ सकती है।

तेजस के इंजन से भारत ने क्या सीखा?

भारत के मौजूदा तेजस लड़ाकू विमान कार्यक्रम में इंजन आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों ने समय पर विमान उत्पादन और आपूर्ति को प्रभावित किया है।

तेजस एमके-1ए में अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस के एफ404 इंजन का इस्तेमाल होता है और इंजन आपूर्ति में देरी को विमान डिलीवरी में बाधा के एक कारण के रूप में बताया गया है।

इसी अनुभव के कारण एएमसीए जैसे अधिक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम में भारत के लिए इंजन की घरेलू क्षमता, आपूर्ति सुरक्षा और तकनीकी नियंत्रण ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

भारत निजी कंपनियों पर क्यों दांव लगा रहा है?

एएमसीए कार्यक्रम में निजी भारतीय कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने का फैसला भी रक्षा उत्पादन नीति में बड़े बदलाव का संकेत है।

भारत लंबे समय तक अत्याधुनिक रक्षा उत्पादन में सरकारी कंपनियों पर काफी निर्भर रहा है। अब निजी क्षेत्र को डिजाइन, निर्माण और विदेशी तकनीकी साझेदारों के साथ संयुक्त परियोजनाओं में अधिक भूमिका दी जा रही है।

इसका उद्देश्य केवल विमान बनाना नहीं, बल्कि देश में एक ऐसा औद्योगिक तंत्र विकसित करना है जो भविष्य में जटिल रक्षा प्रणालियों और प्रोपल्शन तकनीकों का निर्माण कर सके।

क्या इससे भारत को रणनीतिक फायदा मिलेगा?

अगर प्रस्तावित साझेदारी वास्तविक इंजन विकास, उच्च स्तर के तकनीक हस्तांतरण और भारत में व्यापक विनिर्माण क्षमता तक पहुंचती है, तो इसका प्रभाव एएमसीए से कहीं आगे जा सकता है।

भारत को भविष्य के लड़ाकू विमानों के लिए इंजन तकनीक, परीक्षण क्षमता, उत्पादन ढांचा और विशेषज्ञ मानव संसाधन विकसित करने में मदद मिल सकती है।

लेकिन इस पूरी योजना की सफलता केवल साझेदारी की घोषणा से तय नहीं होगी। असली चुनौती यह होगी कि भारत कितनी महत्वपूर्ण तकनीक देश में हासिल कर पाता है और कितनी स्वतंत्र रूप से इंजन का विकास, उत्पादन तथा रखरखाव कर सकता है।

बेबाक24 टेक : रिलायंस और रोल्स-रॉयस की साझेदारी भारत के लिए रक्षा इंजन क्षेत्र में बड़ा औद्योगिक अवसर है। यह अमेरिका से दूरी बनाने के बजाय भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-साझेदार रक्षा नीति को मजबूत करने की कोशिश के रूप में ज्यादा महत्वपूर्ण है। अब असली सवाल यह होगा कि एएमसीए इंजन कार्यक्रम के लिए भारत किस प्रस्ताव को चुनता है और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में कितना वास्तविक नियंत्रण देश के हाथ में आता है।



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