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मक्का समझौते से कितना बढ़ेगा पाकिस्तान का प्रभाव? क्या बन सकता है ‘मुस्लिम नाटो’?

by admin@bebak24.com on | 2026-08-13 15:31:53

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मक्का समझौते से कितना बढ़ेगा पाकिस्तान का प्रभाव? क्या बन सकता है ‘मुस्लिम नाटो’?

नई दिल्ली: पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच मक्का में हुए नए संयुक्त रक्षा समझौते के बाद पश्चिम एशिया की बदलती सुरक्षा राजनीति को लेकर चर्चा तेज हो गई है। 7 अगस्त 2026 को हुए इस समझौते को पाकिस्तान के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर मतभेद है कि क्या यह समझौता आगे चलकर दूसरे मुस्लिम देशों को जोड़ते हुए किसी बड़े सैन्य गठबंधन या तथाकथित ‘मुस्लिम नाटो’ का रूप ले सकता है।

समझौते से पाकिस्तान को कूटनीतिक और रणनीतिक फायदा मिल सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी सैन्य गठबंधन की वास्तविक ताकत इस बात पर निर्भर करेगी कि संकट की स्थिति में उसके सदस्य एक-दूसरे के लिए सीधे सैन्य कार्रवाई करने को कितने तैयार होते हैं।

मक्का समझौते में क्या खास है?

पाकिस्तान ने सऊदी अरब और तुर्की के साथ मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। ये तीनों देश मुस्लिम दुनिया में अपने-अपने स्तर पर महत्वपूर्ण सैन्य, आर्थिक और रणनीतिक क्षमता रखते हैं।

पाकिस्तान परमाणु हथियार रखने वाला एकमात्र मुस्लिम बहुल देश है। तुर्की के पास क्षेत्र की मजबूत सेनाओं में से एक है और वह अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता, खासकर ड्रोन तकनीक, को तेजी से बढ़ा रहा है। वहीं सऊदी अरब के पास बड़ी आर्थिक और वित्तीय ताकत है तथा वह दुनिया के प्रमुख तेल निर्यातक देशों में शामिल है।

इन तीनों देशों का एक साथ आना इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे पाकिस्तान की पश्चिम एशिया में रणनीतिक भूमिका और राजनीतिक पहुंच बढ़ सकती है।

क्या भारत के लिए यह चिंता की बात है?

भारत के पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन के अनुसार, मक्का समझौता पाकिस्तान को निश्चित रूप से कुछ रणनीतिक लाभ देता है और पाकिस्तान इसे भारत के खिलाफ कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकता है।

हालांकि, उनका मानना है कि सऊदी अरब और तुर्की के इस समझौते में शामिल होने का उद्देश्य भारत के खिलाफ किसी संयुक्त सैन्य कार्रवाई की तैयारी करना नहीं है।

उनके अनुसार, भारत के लिए पाकिस्तान के चीन और अमेरिका के साथ बढ़ते संबंध अधिक महत्वपूर्ण चिंता का विषय हो सकते हैं।

पाकिस्तान को कितना फायदा होगा?

पाकिस्तान के सऊदी अरब और तुर्की के साथ सैन्य संबंध पहले से ही पुराने हैं। नया समझौता इन संबंधों को संस्थागत रूप देने की दिशा में एक और कदम माना जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान के लिए इसका सबसे बड़ा लाभ मध्य पूर्व में उसकी रणनीतिक छवि और राजनीतिक प्रभाव का बढ़ना हो सकता है। इस क्षेत्र में पाकिस्तान के महत्वपूर्ण आर्थिक हित हैं। उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से जुड़ा है और बड़ी संख्या में पाकिस्तानी नागरिक सऊदी अरब तथा दूसरे खाड़ी देशों में काम करते हैं।

अमेरिकी शोध संस्था अटलांटिक काउंसिल के विशेषज्ञ माइकल कुगलमैन के अनुसार, यह समझौता पाकिस्तान की उस कोशिश को मजबूत कर सकता है जिसमें वह खुद को केवल एक अस्थिर या जोखिम वाले साझेदार के रूप में नहीं, बल्कि प्रभावशाली क्षेत्रीय शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है।

क्या संकट की स्थिति में सऊदी अरब पाकिस्तान के लिए युद्ध करेगा?

यही इस समझौते से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल है।

विशेषज्ञों का कहना है कि समझौते का होना और उसके तहत युद्ध में सीधे उतरना 2 अलग बातें हैं।

पाकिस्तान का प्रमुख सुरक्षा दबाव फिलहाल भारत के अलावा अफगानिस्तान से भी जुड़ा हुआ है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि सऊदी अरब या तुर्की पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान के खिलाफ सैन्य संघर्ष में शामिल हों।

इसी तरह अगर भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष होता है तो यह मान लेना भी आसान नहीं है कि सऊदी अरब भारत के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करेगा। भारत और सऊदी अरब के बीच भी पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक और आर्थिक संबंध मजबूत हुए हैं।

तुर्की और पाकिस्तान की निकटता को देखते हुए तुर्की की भूमिका अलग हो सकती है, लेकिन वहां भी सीधे सैन्य हस्तक्षेप का कोई स्वतः लागू होने वाला ढांचा अभी स्पष्ट नहीं है।

क्या इसे ‘मुस्लिम नाटो’ कहा जा सकता है?

मक्का समझौते के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इसी सवाल की हो रही है कि क्या यह भविष्य में मुस्लिम देशों का कोई बड़ा सैन्य गठबंधन बन सकता है।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि मिस्र, कतर, अजरबैजान, जॉर्डन और सीरिया जैसे देशों को आगे चलकर इस तरह के किसी व्यापक सुरक्षा ढांचे में शामिल किया जा सकता है।

लेकिन कई विशेषज्ञ इस संभावना को अभी दूर की बात मानते हैं।

मध्य पूर्व परिषद से जुड़े विशेषज्ञ अली बाकिर ने संभावित विस्तार के लिए कुछ मुस्लिम देशों के नाम गिनाए हैं, लेकिन दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि गठबंधन में नए देशों का शामिल होना तभी प्रभावी होगा जब उनके रणनीतिक हित भी एक-दूसरे से मेल खाते हों।

साझा दुश्मन नहीं होना सबसे बड़ी चुनौती

दिल्ली स्थित तक्षशिला संस्थान के निदेशक नितिन पाई के अनुसार, बहुध्रुवीय दुनिया में नाटो जैसे पारस्परिक रक्षा समझौते को लागू करना पहले की तुलना में ज्यादा मुश्किल है।

उनका सवाल है कि अगर किसी सहयोगी देश का दुश्मन आपका दुश्मन नहीं है, तो क्या आप उसके खिलाफ युद्ध में उतरेंगे?

इसी वजह से पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच सुरक्षा सहयोग बढ़ने के बावजूद इसे नाटो जैसी सामूहिक सैन्य व्यवस्था मानना जल्दबाजी होगी।

अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी का भी मानना है कि साझा दुश्मन के बिना कोई समझौता सैन्य सहयोग को बढ़ा सकता है, लेकिन वह जरूरी नहीं कि एक पूर्ण संयुक्त रक्षा संधि में बदल जाए।

तीनों देशों की अपनी-अपनी प्राथमिकताएं

इस गठबंधन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि तीनों देशों की सुरक्षा प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।

पाकिस्तान की प्रमुख चिंताओं में भारत और अफगानिस्तान शामिल हैं। सऊदी अरब के लिए ईरान, क्षेत्रीय अस्थिरता और हूती खतरा प्रमुख मुद्दों में हैं। वहीं तुर्की की सुरक्षा प्राथमिकताओं में अपने आसपास के क्षेत्र, रक्षा उद्योग और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन से जुड़े विषय महत्वपूर्ण हैं।

ऐसे में किसी एक देश के खिलाफ हुई सैन्य कार्रवाई पर बाकी दोनों देश किस स्तर तक प्रतिक्रिया देंगे, यह अभी साफ नहीं है।

फिर भी समझौता महत्वपूर्ण क्यों है?

विशेषज्ञों का मानना है कि मक्का समझौते को केवल युद्ध की स्थिति में सैन्य सहयोग के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। इसका महत्व रक्षा सहयोग, सैन्य प्रशिक्षण, हथियार और तकनीकी सहयोग, खुफिया साझेदारी और राजनीतिक समन्वय में भी हो सकता है।

अगर आने वाले वर्षों में इसमें और देश शामिल होते हैं और आपसी सैन्य तंत्र मजबूत किया जाता है, तो पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था में इसका असर बढ़ सकता है।

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि मक्का समझौते ने पाकिस्तान की रणनीतिक प्रोफ़ाइल को मजबूत किया है, लेकिन इसे ‘मुस्लिम नाटो’ कहना अभी जल्दबाजी होगी। इसकी असली ताकत इस बात से तय होगी कि किसी वास्तविक संकट के समय समझौते के सदस्य कितनी दूर तक एक-दूसरे के साथ खड़े होते हैं।



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